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बढ़ती जा रही है बिजली बोर्ड में घाटे की खाई

झारखंड बिजली बोर्ड घाटे में है। घाटे की खाई घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है बिजली चोरी के कारण होनेवाला लाइन लॉस। बिजली चोरी के नये-नये तरीके देख बोर्ड के अधिकारी भी हैरत में पड़ जाते हैं। बोर्ड इसपर अंकुश के लिए अब तक कारगर मुहिम चलाने में विफल रहा है। बोर्ड के अफसरों पर आरोप लगता है कि बिजली की चोरी में उनकी भी सहमति रहती है, क्योंकि इसके एवज में उन्हें बंधी-बंधायी रकम मिलती है। बोर्ड के अधिकारी सफाई देते हैं कि दंडाधिकारी और पुलिस बल के अभाव में बिजली चोरी के खिलाफ लगातार अभियान नहीं चल पाता। यही कारण है कि वर्ष 2001-02 में बिजली बोर्ड का लाइन लॉस जहां 42.20 प्रतिशत था, वह 2007-08 में बढ़कर 43.08 प्रतिशत हो गया। 2004-05 में तो यह 53.प्रतिशत तक पहुंच गया था। लाइन लॉस का असर बोर्ड की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। बोर्ड राजस्व बढ़ाने के लिए बिजली दर बढ़ाने का प्रस्ताव देता रहा है। विद्युत नियामक आयोग बोर्ड के तर्क को खारिा करता रहा है। आयोग तर्क देता रहा है कि बोर्ड अपनी विफलता का बोझ आम उपभोक्ताओं पर नहीं डाल सकता। राजस्व बढ़ाना है तो उसे लाइन लॉस में कमी लानी होगी। बिजली वितरण और वसूली के अंतर को पाटना होगा। बोर्ड के एक मुख्य अभियंता का मानना है कि स्पेशल कोर्ट का गठन अनिवार्य हो गया है। बिजली चोरी करने वालों पर प्राथमिकी दर्ज की जाती है। अदालतों में यह मामले वर्षो चलते रहते हैं। प्राथमिकी दर्ज कराने का कोई लाभ बोर्ड को नहीं होता। समझौते के बाद पत्र पर बिफर चेयरमैन, कहा ं

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