class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सरकारी अस्पताल तो ऐसे ही मारते हैं मायादेवियों को

घटना बुधवार रात की है। माढ़ामऊ पुरवा गाँव की आशा कार्यकर्ता एक गर्भवती महिला को लेकर मोहनलालगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुँची तो उसे शहर के अस्पताल जाने को कहा गया। नर्सो का कहना था कि महिला को दर्द नहीं उठ रहा है। यहाँ दिक्कत होगी। आशा कार्यकर्ता उस महिला को लेकर डफरिन अस्पताल गई। रात में ही उसने सामान्य प्रसव से बच्चे को जन्म दिया। इस संवाददाता को आशा ने बताया कि यह काम आसानी से सीएचसी में हो सकता था पर उसे व गर्भवती महिला को नाहक इतनी दूर दौड़ाया गया। दरअसल सरकारी तंत्र की यही संवेदनहीनता बांदा की मायादेवी जसे हादसों को जन्म देती है। पहले भी कई गरीब दलित गर्भवती महिलाएँ सिर्फ डॉक्टरों के संवेदनहीन होने की वजह से बेवक्त मौत का शिकार बनी हैं। गैर सरकारी संगठन हेल्थ-वॉच ने जनवरी 2007 से फरवरी 2008 के बीच प्रदेश के 10 जिलों में किए सव्रेक्षण में ऐसी ही लापरवाहियों के 72 मामले ढूँढे हैं। इन मामलों में गर्भवती महिलाओं को पैसा न देने पर सरकारी इलाज मुहैया नहीं कराया गया। 32 मामले दलित औरतों के हैं। इनमें से आठ की डिलिवरी के दौरान मौत हो गई। चार ऐसी थीं जो जननी सुरक्षा योजना का लाभ लेने के वास्ते अस्पताल गई थीं।ड्ढr यह सव्रेक्षण लखनऊ, कानपुर, मिर्जापुर, चंदौली, बांदा, गोरखपुर, मुजफ्फरनगर और आजमगढ़ आदि जिलों में किया गया था। दो मामले तो कानपुर देहात के ही हैं। 30 नवम्बर 2007 को कमला और देवरानी नाम की महिलाओं की मौत कानपुर देहात के सरकारी अस्पताल में हुई थी। हेल्थ वॉच की प्रवक्ता ने बताया कि इन्हें खुद स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा अस्पताल लेकर गई थी। इन लोगों की डिलिवरी कराने वाली मुख्य नर्स ने पाँच सौ रुपए व दो अन्य नर्सो ने 50-50 रुपए का नेग लिया था। उसके बाद जब इन महिलाओं की ब्लीडिंग शुरू हो गई तो परिवार वालों ने देखने को कहा। दोबारा देखने के लिए फिर पैसों की माँग हुई। पैसा देने के बावजूद इन महिलाओं को बचाया न जा सका और दोनों की मौत हो गई। इस रिपोर्ट का पता चलने के बाद हिन्दुस्तान ने कानपुर देहात के घाटमपुर, सीतापुर के महमूदाबाद और लखनऊ के मोहनलालगंज व काकोरी सामुदायिक केन्द्रों का दौरा किया तो पाया कि वाकई स्थिति काफी खराब है। सभी केन्द्रों में मिली आशा कार्यकर्ताओं ने बताया कि सबसे ज्यादा मुश्किल का सामना उन्हें करना पड़ता है। वे गाँव की महिलाओं को बड़ी मुश्किल से मनाकर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र तक लाती हैं पर यहाँ से उन्हें नर्सिग होम या जिले के अस्पताल में जाने के लिए कहा जाता है। खासतौर पर ऐसी औरतें जिनका पहली बार प्रसव होना होता है।ड्ढr आशा कार्यकर्ताओं की तकलीफ है कि वे आखिर किस तरह ग्रामीण महिलाओं को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए जागरूक करं जब सरकारी अस्पतालों का यह हाल है। आशा कार्यकर्ता कहती हैं कि गाँव में जिन परिवारों में सदियों से घरों में प्रसव कराए जाते रहे हैं। उन्हें सरकारी अस्पतालों तक लाना मुश्किल काम होता है। ऐसे में अस्पतालों में होने वाले हादसे उन्हें और डरा देते हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के उद्देश्यों को पूरा करना है तो सरकारी तंत्र तो कम से कम अपनी स्वार्थी सोच को बदलना चाहिए।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: सरकारी अस्पताल तो ऐसे ही मारते हैं मायादेवियों को