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कितना कारगर होगा नया प्रयोग

अंतत: मिनी विधानसभा का गठन हो गया। स्पीकर आलमगीर आलम ने परंपरा से हटकर कुछ पुरानी समितियों का वजूद खत्म कर इस बार कुछ नयी समितियां भी बनायी हैं। जनहित से सीधे जुड़े विषयों को इनमें शामिल किया गया है। मसलन कृषि, सिंचाई, खाद्य आपूर्ति, पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन और ग्रामीण विकास (नरगा, इंदिरा आवास, सामाजिक सुरक्षा) जसे विषयों को महत्व दिया गया है। फिर श्रम (औद्योगिक, खान, असंगठित और बाल) कल्याण और राजस्व (उत्पाद, परिवहन और सेल्स टैक्स) जसे महत्वपूर्ण विषयों को भी समिति के दायर में लाना अनूठा प्रयोग है। स्पीकर का यह नया प्रयोग तभी कारगर होगा, जब समितियों की रिपोर्ट और अनुशंसाएं पारदर्शी हों और सरकार उन पर कार्रवाई कर। वरना इनका भी वही हश्र होगा- जो पहले की समितियों का होता रहा है। विधानसभा समितियों का काम आज महा तफरीह करने और रिपोर्ट की लीपापोती में ही सिमटता जा रहा है। समितियों का गठन इसलिए होता है कि जब हाउस नहीं चल रहा होता है, तब समितियां मिनी विधानसभा की तरह काम करती हैं। जनहित से जुड़ी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ती हैं। कुछ समितियां ईमानदार ढंग से काम भी करती हैं। रिपोर्ट और अनुशंसाएं भी देती हैं, लेकिन सरकार उनकी रिपोर्ट डस्टबिन में डालकर निश्िंचत हो जाती है। अब तक दर्जनभर से ज्यादा कमेटियों की रिपोर्ट सरकारी ऑफिसों में धूल फांक रहीं हैं। एसी स्थिति में ही समितियां भी अपनी मौलिक भूमिका से विमुख हो जाती हैं। समितियों को सार्थकता सिद्ध करनी होगी : नामधारी पूर्व स्पीकर इंदर सिंह नामधारी कहते हैं कि विधानसभा की समितियां लोकतंत्र का हथियार हैं। इनका उपयोग जनहित में किया जाना चाहिये। नयी समितियों के गठन की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब विधायक पारदर्शी और ईमानदार रिपोर्ट दें। फिर सरकार उनकी रिपोर्ट और अनुशंसाओं पर कार्रवाई कर। अन्यथा समितियां टीए-डीए का माध्यम बनकर रह जायेंगी या पैसे कमाने का जरिया।

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