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बाल विकास और पुष्टाहार की कोई व्यवस्था नहीं

चार साल पहले जब जिले में बाल विकास और पुष्टाहार की कोई व्यवस्था नहीं थी, तब गाँवों में दस फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार थे। और, जब मिड-डे मील एवं आँगनबाड़ी के जरिए पौष्टिक भोजन का इंतजाम हो गया तो कुपोषण पाँच फीसदी सालाना की दर से बढ़ने लगा और 2007 तक बढ़ कर तीस प्रतिशत हो गया। यह जानना भी रोचक है कि पुष्टाहार के लिए हर साल 16 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं लेकिन अब कोई अफसर इस उलटबाँसी की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।ड्ढr जिले में विटामिन-ए पटल के प्रभारी वसीम अहमद खान का कहना है कि 2002 तक विटामिन-ए का घोल पिलाने की शुरुआत होने से पहले सौ में दस बच्चे कुपोषण का शिकार थे। फिर पुष्टाहार वितरण योजना शुरू हुई और कुपोषित बच्चे पाँच प्रतिशत की दर से बढ़ने लगे। मुख्य चिकित्साधिकारी डा. रवीश गर्ग के साथ अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. के.के. सक्सेना मानते हैं कि बच्चों को प्रोटीनयुक्त भोजन न मिलने से कुपोषण बढ़ा पर वह इसके लिए खुद को नहीं बाल विकास एवं पुष्टाहार के अधिकारियों को दोषी मानते हैं। दूसरी ओर, बाल विकास एवं पुष्टाहार की परियोजना अधिकारी कमला मिश्रा व शहर क्षेत्र की सुपरवाक्षर सुनीता उपाध्याय कहती हैं कि इस हालत के लिए स्वास्थ्य विभाग दोषी है। स्वास्थ्य अधिकारी विटामिन-ए का घोल समय से पिलाते ही नहीं। इस संबंध में प्रभारी जिलाधिकारी एके द्विवेदी का कहना है कि बढ़ते कुपोषण को गंभीरता से लिया जाएगा।

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  • Web Title: बाल विकास और पुष्टाहार की कोई व्यवस्था नहीं