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राजरंग

राज्य के एगो बड़े साहेब से उनके मातहत आजकल बहुते परशान हैं। हर दिन उनके तबादले की दुआ कर रहे हैं। कर्मचारी तो एतना तक परशान हैं कि कोई उनके साहेब का तबादला करा दे तो चंदा उठाकर उसे प्रसाद चढ़ाने को भी तैयार हैं। साहेब भी पहले मलाईदार पोस्टवा में थे। खूबे मलाई काटे। मन लगल रहता था। साल में दो बार ट्रांसफर-पोस्टिंग का मौसम आये तो मन गदगद रहता था। अब अचानके सरकार ने उनको संटिंग में डाल दिया। यहां तो चाय पर भी आफत है। मंथली पेमेंटवा पर ही सतोष करना पड़ रहा है। साहेब सुबह से शाम तक फाइल में सिर गोथे रहते हैं। एके फइलवा को पांच दफा ऑब्जेक्शन डाल कर लौटा देते हैं। स्टेनो भी नया है, सो साहेब को फइलवा में अभी अपनही से नोट लिखना पड़ता हैं। लिखावट भी अइसन है कि कर्मचारी पढ़-पढ़ के सिर धुनते रहते हैं। एक लाइन में पांच गो गलती निकालते हैं। साहेब का टाइम भी पास नय होता है। अब उहो चाहते हैं कि कोई उनका यहां से ट्रांसफर करा दे। साहेब अकेले रहते हैं तो मने-मन गाते रहते हैं- तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, वापस..।

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