class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हॉकी को खाद-पानी की जरूरत

असलम शेर खां के रग-रग में रची-बसी है हॉकी। इन्हें1ी विश्वकप हॉकी के उस सेमीफाइनल के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने मैच के अंतिम क्षणों में पेनॉल्टी कार्नर को गोल में बदल कर भारत को फाइनल में पहुंचाया था और भारत ने वह प्रतियोगिता जीत ली थी। उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमाए। वह केंद्रीय राज्यमंत्री भी रहे। कुछ दिनों के लिए भाजपा में भी शामिल हुए। हॉकी फेडरशन से के पी एस गिल की विदाई के बाद जब उन्हें भारतीय हॉकी की बागडोर सौंपी गई तो उनसे रूबरू हुए विशेष संवाददाता जयशंकर गुप्तड्ढr भारतीय हाकी की दशा-दुर्दशा देखकर क्या लगता है? दशा क्या दुर्दशा ही है। हमार जसे लोगों के लिए यह शर्मनाक है कि अस्सी वर्ष के इतिहास में पहली बार हमारी टीम ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई नहीं कर सकी। बीजिंग में भारतीय हॉकी टीम नहीं होगी। दोहा एशियाई खेलों के दौरान हमरी टीम चीन से हार गई और हम एक भी पदक नहीं जीत सके। जीत का जज्बा हमसे दूर हो गया है।ड्ढr क्या अकेले के पी एस गिल ही इसके जिम्मेदार थे? पिछले एक-डेढ़ दशक में जिस तरह से भारतीय हॉकी की दुर्दशा हुई है, उसके केंद्र में गिल और उनकी देख-रख में चल रहा भारतीय हॉकी फेडरशन ही थे। उनकी सैडिस्टिक मानसिकता यानी किसी खिलाड़ी विशेष के साथ उनकी खुन्नस इस बात को लेकर भी हो सकती थी कि वह इतना लोकप्रिय क्यों हो रहा है। इन कारणों से वह किसी खिलाड़ी से निबटने के लिए उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ भी कर सकते थे। बात-बेबात कोच को बदल देते थे। अपमानित करते थे। इससे कोच और खिलाड़ियों का मोरल बहुत डाउन हुआ। लेकिन जिस तरह से उन्हें हटाया गया?ड्ढr और कोई रास्ता नहीं रह गया था। 14 वर्षो के लंबे इतिहास में कई अवसर आए जब वे सम्मान के साथ पद छोड़ सकते थे। दूसरों को मौका दे सकते थे। उनका पद ऑनररी था। इससे उनकी रोी-रोटी नहीं जुड़ी थी। तमाम तरह के आरोपों और खासतौर से ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाने के बाद भारतीय हाकी फेडरशन को लेकर उठे विवादों के बावजूद पद पर बने रहने की उनकी हठधर्मिता के कारण भारत सरकार के मंत्री को उनसे पद छोड़ देने के लिए कहना पड़ा, लेकिन तब भी वह नहीं माने। ज्योति कुमार के खिलाफ हुए स्टिंग ऑपरशन के बाद फेडरशन ऑफ इंटरनेशनल हाकी ने भी कहा कि हम किसी ऐसी भ्रष्ट संस्था से डील नहीं कर सकते जो खिलाड़ियों का चयन पैसे लेकर करती हो। इस सबके बीच तंग आकर भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए भारतीय हाकी फेडरशन को भंग किया। क्या भारतीय हाकी फिर कभी अपने सुनहर अतीत को पा सकेगी?ड्ढr क्यों नहीं? उन क्यारियों में फिर से खाद-पानी देने की जरूरत है। इन्शा अल्लाह यह फिर से हरी-भरी हो जाएगी।ड्ढr आपकी अध्यक्षता में बने पूर्व खिलाड़ियों के पैनल की क्या योजनाएं हैं? इसके लिए तीन स्तरों पर हाकी का कार्यक्रम बनाना होगा। एक तो हमें तात्कालिक प्राथमिकता के तौर पर अभी मलयेशिया में सुल्तान अजलानशाह टूर्नामेंट के लिए टीम का चयन, प्रशिक्षण पारदर्शी ढ़ंग से करना होगा। जो खिलाड़ी दरकिनार कर दिए गए थे, सबको इनवाल्व करंगे। उनमें भरोसा पैदा करंगे। समय कम है। हमार पास घरलू हॉकी के जितने भी रिसोर्स थे और जहां हाकी के टूर्नामेंट होते थे, उन सबको पुनर्जीवित करना होगा। वहीं से प्रतिभाएं निकलेंगी और विकसित होंगी। तीसर, ‘सिक्स ए साइड’ यानी एक तरफ छह खिलाड़ी वाली हाकी का चलन स्कूल-कॉलेजों और कस्बों में भी शुरू करना होगा। ड्ढr क्या वजह है कि नए-नए देश छा रहे हैं और हम पिछड़ते जा रहे हैं?ड्ढr यह सही है कि चीन, कोरिया और जापान जसे नए-नए देश हाकी के क्षेत्र में आ रहे हैं और अच्छा कर रहे हैं। यूरोपियन एवं आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड की मजबूत आधारशिला बन गई है। उनकी चुनौती को स्वीकार करते हुए ही हमें अपनी टीम तैयार करनी होगी। पहले हाकी घास के हर मैदानों पर खेली जाती थी, अब कृत्रिम ऐस्ट्रोटर्फ का जमाना है। पहले हॉकी की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पधाओं में भारत और पाकिस्तान की हाकी का मुकाबला करने की तैयारी पूरी दुनिया करती थी। अभी हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। अब हमें अपनी रणनीति दुनिया की हाकी टीमों को सामने रखकर बनानी होगी।ड्ढr पाकिस्तान की हाकी के बार में भी कुछ कहेंगे?ड्ढr पाकिस्तान की हाकी कुछ दिनों तक तो चली, 1तक उन्होंने अपनी सुप्रीमेसी बनाए रखी। लेकिन बाद में वे भी हमारी तरह लेथार्जिक होते गए। आज हम दोनों देश तकरीबन बराबरी के स्तर पर हैं।ड्ढr क्या क्रिकेट की चमक के कारण भारतीय हाकी फीकी पड़ रही है?ड्ढr मेरी राय में पैसों और क्रिकेट की चमक के कारण नहीं बल्कि हमार कर्मो के कारण हाकी फीकी पड़ रही है। आप जीतने लगेंगे तो चमकने भी लगेंगे।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: हॉकी को खाद-पानी की जरूरत