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राजरंग

लालबाबू अब तक रुठल हैं। पार्टीवाले गा रहे हैं रुठे-रुठे.. मनाऊं कैसे। कुछ लोग यह भी गुनगुना रहे हैं-रुठा-रुठी छोड़ दो। देखें लाल बाबू का गुस्सा कब शांत होता है। तीन दिन पहले दिल्ली से मैडम आयी थीं। लालबाबू के लिए करुणा दिखा गयीं। वर्करों से कह गयीं- सेंट्रल लीडरशिप उनके बार में सोचेगा। आपलोग नाहक समय जाया मत करिये। इलेक्शन कभियो हो सकता है। उसकी तैयारी कीािये। पार्टीजन सोच रहे हैं कि इलेक् शन के पहले लालबाबू आ जायें, तो भोट मांगना आसान हो जायेगा। जब कमल उगाते थे, तब पार्टी का जनाधार बढ़ा था। छोड़े तो अपनी पार्टी बना लिये। अब उसका जनाधार बढ़ा रहे हैं, लेकिन केतनो लोग को जोड़ लें, सीएम की कुरसी दूर रहेगी। फिर से कमल थाम लेंगे, तो उनकी भी राह आसान हो जायेगी और दूसर भी मलाई काट सकेंगे। असल में छह साल तक मलाई खाते रहे। आदत खराब हो गयी है। अब विपक्ष में बैठने में मजा नय आ रहा। सत्तावाला लोग आपसे में लड़-भिड़ रहा है। हर दल दूसर को कोस रहा है। इसका फायदा उठाया जाये। लालबाबू आ गये, तो इ काम एकदमे मुश्किल नय होगा। अब खाली करुणा दिखाने से काम नहीं चलेगा। मैडम को कुछ कर दिखाना होगा। दिल्ली से मक्खन बाबू आये थे। तीन महीना खूबे हंगामा किये। रोो डराते थे कि समर्थन ले लेंगे। कहां वापस लिये, सरकार चल रही है। लेकिन कमल खिलाने के लिए कुछ गुल खिलाना होगा।

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