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समझदारी की शिक्षा

पिछला अंडर-1क्रिकेट विश्व कप का फाइनल जिन्होंने देखा था उन्हें किशोर भारतीय खिलाड़ियों का आक्रामक अंदाज अच्छी तरह याद होगा। लेकिन उस दौर पर गए एक अधिकारी का कहना है कि सार खिलाड़ियों के लिए इस दौर पर एक परशानी की वजह यह भी कि अगर उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ पुरस्कार मिलेगा तो फिर वे टीवी पर सवालों के जवाब कैसे देंगे। इसमें अंग्रेजी बोलने में दिक्कत से ज्यादा प्रचार औार शोहरत की तीखी रोशनी का संकोच और डर था। यह आक्रामकता और यह संकोच उस नए भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी के व्यक्ितत्व के दो पहलू हैं, जो एक आम भारतीय नौजवान की जिन्दगी और क्रिकेट की चमक-धमक के बीच संतुलन अक्सर नहीं बिठा पाता। अच्छा यह है कि बीसीसीआई अपने खिलाड़ियों की काउंसिलिंग के लिए व्यवस्था करने की सोच रही है, जिसमें मैदान और बाहर व्यवहार करने, मीडिया से संवाद करने से लेकर तो पैसे का सही इंतजाम करने के बार में बताया जाएगा। हरभजन-श्रीसंत प्रकरण के बाद खासतौर पर ऐसी काउंसिलिंग की जरूरत ज्यादा महसूस की जा रही है। ऐसा कई खिलाड़ियों के साथ हुआ है कि अचानक मिले पैसे, शोहरत और ग्लैमर को न संभाल पाने के कारण उनके खेल करियर पर भी खराब असर हुआ। पहले खेल में ग्लैमर और पैसा कम था, खिलाड़ी भी अक्सर महानगरों से आते थे और कॉलेज स्तर की पढ़ाई कर लेते थे। अब क्रिकेट में अथाह पैसा और ग्लैमर है, खिलाड़ी विभिन्न पृष्ठभूमियों से आ रहे हैं और ज्यादातर स्कूल के बाद ही पेशेवर खिलाड़ी बन जाते हैं। ऐसे में ‘कल्चरल शॉक’ झेलना थोड़ा मुश्किल पड़ता है। ‘खेलोगे कूदोगे, होगे खराब’ वाला जमाना यह नहीं है और कम से कम क्रिकेट में तो नौजवान खेल कूद कर ही नवाब बन रहे हैं, ऐसे में थोड़ी बहुत जरूरी शिक्षा उन्हें करियर के शुरू में ही मिल जाए तो अच्छा होगा, ताकि उनका दृष्टिकोण ज्यादा व्यापक और परिपक्व हो सके। जब क्रिकेट खिलाड़ी समाज की आँख के तार बन गए हैं, तो उनका आचरण भी संतुलित और विवेकसम्मत हो, यह उनके लिए, क्रिकेट के लिए और समाज के लिए बेहतर है।

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