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फिर अनिवार्य होगा नेट

उच्च शिक्षा के गिरते स्तर की रिपोर्टों से चिंतित सरकार उच्च शिक्षा में संकाय सदस्यों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) को फिर से अनिवार्य शर्त बनाने पर विचार कर रही है। दो साल पहले ही इससे छूट दी गई थी। योजना आयोग के सदस्य बी.एन. मुंगेकर की अध्यक्षता वाली एक समिति ने सरकार से यह सिफारिश की बताई जाती है कि देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए नेट को छंटाई का माध्यम बनाया जाए। जून 2006 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने मुंगेकर समिति की रिपोर्ट की अंतरिम सिफारिशों के आधार पर ही पीएचडी और एमफिल डिग्री धारकों को इससे छूट दी थी। लेकिन शिक्षाविदों से देशव्यापी विचार-विमर्श के बाद अब इस समिति ने अपनी अंतरिम सिफारिशों को उलट दिया है। शिक्षाविदों की यह राय है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के उच्च मानदंडों को बनाए रखने के लिए नेट परीक्षा अनिवार्य बनाई जाए। यूजीसी ने दो साल पहले जब अंतरिम सिफारिश के आधार पर यह छूट दी थी तो शिक्षाविदों ने यह तर्क देकर इसका विरोध किया था कि देश में पीएचडी और एमफिल की डिग्रियों की वैधता को परखने के लिए कोई उपयुक्त व्यवस्था नहीं है। इसपर यूजीसी का तर्क था कि नेट की शर्त से इसलिए छूट दी जा रही है ताकि विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों के विशाल संख्या में खाली पड़े पदों को भरा जा सके। 24 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों के पदों में से करीब 21 फीसदी अभी तक नहीं भर जा सके हैं। राज्य विश्वविद्यालयों के मामले में करीब 15 फीसदी पद खाली पड़े हुए हैं।

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