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गतिरोध बरकरार

चीन और दलाई लामा के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता के सकारात्मक परिणाम शीघ्र निकलने की उम्मीद किसी को नहीं थी, इसलिए इसके अचानक समाप्त होने पर किसी को हैरत नहीं हुई है। हैरानी इसको लेकर है कि यह वार्ता दो-तीन दिन तक चलने की आशा थी, पर चंद घंटों से आगे नहीं बढ़ पाई। राहत यह है कि दोनों पक्षों ने फिर वार्ता करने का फैसला लिया, पर चीन ने कुछ शर्ते भी जोड़ दी हैं। उसने तिब्बतियों से पहले हिंसा रोकने के लिए विश्वसनीय कदम उठाने की मांग की है। कुछ समय पहले भारी अंतरराष्ट्रीय राजनयिक दबाव में चीन वार्ता को राजी हुआ था। उसकी तात्कालिक मजबूरी अगस्त, 2008 में बीजिंग में होने वाले ओलम्पिक खेल हैं, अत: वह नहीं चाहता कि तिब्बत को लेकर बड़ा बखेड़ा खड़ा हो और उसकी छवि पर बुरा असर पड़े। ओलम्पिक खेल के बहाने तिब्बतियों को विरोध प्रदर्शन कर अपने मसले पर विश्व बिरादरी का ध्यान खींचने और चीन को भारी दबाव में लाने का सुनहरा मौका मिल गया। लंबे समय के बाद दोनों पक्षों में वार्ता फिर शुरू होने का यही एक सबसे प्रमुख कारण है। मुद्दे की बात यह है कि क्या चीन अपना अड़ियल रवैया छोड़ तिब्बत के मसले के हल के लिए सार्थक प्रयास करगा? यह फर्क जरूर आया है कि आज चीन एक बड़ी वैश्विक ताकत है और इस नाते वह लाठी-डंडे की पुरानी नीति जारी नहीं रख सकता। इस कारण नरम रुख के साथ कड़े तेवर अपनाना चीन की नजर में जरूरी जान पड़ता है। ल्हासा में हिंसा को लेकर दलाई लामा को आतंकवादी तक कह डालना और फिर कुछ दिन बाद उनके प्रतिनिधियों के साथ वार्ता के लिए तैयार होना यही दर्शाता है कि मौजूदा विश्व में यथार्थवादी बनने पर ही उसके हित सध सकते हैं। मुमकिन है कि फिलहाल ओलम्पिक खेलों को सफलतापूर्वक निपटाने के लिए तिब्बत पर वार्ता का वह दिखावा कर रहा हो। तिब्बती पक्ष भी इस चाल को समझ रहा होगा। लेकिन, वैश्वीकरण के इस युग में अशांति-अस्थिरता-असंतोष चीन के हित में कतई नहीं, क्योंकि विश्व शक्ित के नाते लचीलापन दिखाना समय की जरूरत है। शायद चीन को इस बात का अहसास होगा।ं

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