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भुखमरी और अपच के बीच पर-उपदेश

हाल में हमारे विद्वान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने अपने प्यारे देशवासियों को बिन मांगे एक अद्भुत सलाह दे डाली। उन्होंने यह राय दी कि तेजी से बढ़ती महंगाई के लिए एक बहुत बड़ी सीमा तक निजी क्षेत्र में प्रबंधकों को दी जाने वाली मोटी-मोटी पगार जिम्मेदार हैं, इनमें कटौती के बारे में सोचा जाना चाहिए। सबसे अटपटी बात यही जान पड़ती है कि जब अभी हाल में सरकारी बाबुओं की तनख्वाह में बेशुमार बढ़ोतरी सुझाने वाले छठे वेतन आयोग की सिफारिशें पेश की गई थीं, तो प्रधानमंत्री समेत तमाम लोग इस मामले में एकमत थे कि सरकार के आला अफसरों को निजी क्षेत्र के प्रबंधकों के बराबर वेतन दिए बिना उनस कार्यकुशलता या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की उम्मीद करना बेमानी है। अब अगर महंगाई पर काबू पान के लिए निजी क्षेत्र के प्रबंधकों की तनख्वाहों में कटौती की बात उठाई जा रही है तो यह मांग करना भी तर्कसंगत है कि सरकारी अफसरों को भी अपनी पेटी कसते हुए तोंदें भीतर खींचने की जरूरत महसूस होनी चाहिए। पुरानी कहावत है ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। पाठकों को याद दिलान की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री समेत भारत में ऐसे अनुभवी ईमानदार प्रशासकों की तादाद काफी बड़ी है, जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों, वर्ल्ड बैंक आदि में कुछ वर्ष नौकरी करन के बाद जीवन भर करमुक्त पेंशन का सुख भोगन के अधिकारी हैं। यह बात भी याद दिलान की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि पसंददीदा सरकारी अफसर को उपकृत करन का सबसे बेहतरीन तरीका यही समझा जाता है कि उसे किसी संयुक्त राष्ट्र अभियान का सदस्य नामजद कर दिया जाए या भारत के प्रतिनिधि के रूप में उसे किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन में मनोनीत कर दिया जाए। प्रधानमंत्री सचिवालय में काम करने वाले अनेक अधिकारियों के अलावा कई पूर्व गृह-सचिव या अन्य ऐसे सचिव जा कैबिनेट सचिव होन की दौड़ की वरीयता में आगे रहन के बाद पिछड़ गए हों, इसी तरह संतुष्ट रखे गए हैं। वित्त मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार जिन्हें राजनैतिक कारणों से तत्काल पदमुक्त करन की मजबूरी हो, एशियन बैंक जैसे सुखद चारागाहों को पठाए जाते रहे हैं। आम आदमी को तो इस बात की खबर तक नहीं कि जाने कितने ऐसे पद और प्रतिनियुक्ितयां हैं, जो इस तरह की अप्रत्याशित कमाई करमुक्त आकाशवृत्ति का अवसर सुलभ कराती है। यहां जिक्र सिर्फ वेतन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, नई दिल्ली लुटियंस जोन के जिस शाही इलाके में कई-कई एकड़ जमीन पर फैले बंगलों में रिहाइश का स्वर्गीय सुख सरकारी अफसर भोगते हैं, उनका बाजार भाव पर किराया लाखों रुपए स कम कतई नहीं। सेवाकाल के दौरान मिलने वाली सुविधाओं और विशेषाधिकारों की कीमत भी बाजार भाव पर ही आंकी जानी चाहिए। यह बात सिर्फ देश की राजधानी में काम करने वाले अधिकारियों पर लागू नहीं होती, बल्कि देश भर के अफसरों के बारे में विचारणीय है। औपनिवेशिक शासनकाल में माई-बाप गौरांग महाप्रभुओं के एशो-आराम के लिए जो विराट महलनुमा बंगले जिलाधीशों, पुलिस अधीक्षकों तथा अन्य हाकिमों के लिए मुकर्रर किए गए थे, आज भी पूरे तामझाम के साथ बरकरार हैं। सरकार के आलाअफसर विदेशी दौरों के दौरान बड़ी आसानी से अपने किफायती टिकटों का उच्चीकरण सार्वजनिक प्रतिष्ठान के एयर इंडिया में बदस्तूर करवाते रहते हैं। सरकारी अफसरों की तरफ तो उंगली उठान का साहस कभी कभार कोई सिरफिरा कर भी लेता है, पर सदन की अवमानना का ब्रह्मास्त्र हाथ में थामे विशेषाधिकारों का कवच पहने सांसदों-विधायकों के बारे में ऐसा सोचना तक देशद्रोह सरीखा पाप है। बिना दैत्याकार पैमाने पर सरकार की फिजूलखर्ची में कटौती की पेशकश किए बिना सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधकों की पगार पर अब तक लार चुआने वालों का सीख देना समझ नहीं आता। इस बात को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि यह ऊंची तनख्वाह पाने वाले ही दर्जनों ऐसे खर्च करते हैं, जो अब तक बेरोजगार रहने वालों के लिए रोजगार पैदा करन के अवसर सुलभ कराते हैं। विलासितापूर्ण उपभोक्तावादी खर्च पर नाममात्र को भी लगाम लगाना अब असंभव हो चुका है। ऐसे में स्वेच्छा से गरीबी का वरण करने या अपनी तनख्वाहों में कटौती करन की सलाह सिर्फ भ्रष्टाचार और पाखंड को ही बढ़ावा दे सकती है। सबसे विकट विडंबना यह है कि हमारा प्यारा देश एकसाथ भुखमरी और अपच का शिकार है। मुट्ठी भर शासक वर्ग से जुड़े लोग खाये-पीये खासे मोटाये और अपनी सेहत के प्रति फिकरमंद और लाखों ऐसे हैं, जो न सही भुखमरी मगर घोर कुपोषण के शिकार हैं, महंगाई के बुरी तरह मारे हुए हैं। जिन्हें इस बहस से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला कि प्रधानमंत्री की सलाह को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के या निजी क्षेत्र के स्वामी प्रबंधक स्वीकार करेंगे भी या नहीं। जब से देश में आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई तब से निरंतर यह तर्क पेश किया जाता रहा है कि भारत की प्रगति के लिए एक उदीयमान शक्ित के रूप में उसके प्रकट होन के पीछे यही बात जिम्मेदार है कि आर्थिक क्रियाकलाप को राजनैतिक शिकंजे से मुक्त कर दिया गया है। जब-जब जनकल्याणकारी राज्य में आर्थिक क्रियाकलाप को सरकार द्वारा नियंत्रित करन की बात उठी है, इसकी भर्त्सना बदनाम परमिट राज की वापसी कहकर की जाती रही है। जब तक सेंसेक्स आसमान छू रहा था और सटोरियों के इसी क्लब को देश की आर्थिक सेहत का सबसे बेहतर पैमाना माना जा रहा था, तब तक किसी को इस बात की चिंता न थी कि पानी का बुलबुला कभी भी फूट सकता है। खेती के लिए सबसे उपजाऊ जमीन को विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तब्दील करन के उतावलों को यह सोचन की फुर्सत ही कैसे हो सकती थी कि अगर अनाज पैदा ही नहीं होगा तो फिर लोगों की भूख कैसे मिटेगी? हमारे कृषि मंत्री का आयात वाला नुस्खा भले ही मध्यवर्गीय ग्राहकों को थोड़ी-बहुत राहत पहुंचा सकता हो। पर वंचित और निर्बल-निधर्न व्यक्ित के लिए यह स्थिति दारुण है। घाव पर नमक छिड॥कने वाले अंदाज में अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश में बढ़ती कीमतों के लिए बेशुमार खाना भकोसने वाले हिन्दुस्तानियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। जो लोग पैसे वाले हैं, वे तो हमेशा से अजीर्ण के शिकार होते हैं। इस परिस्थिति में प्रधानमंत्री तथा उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों की यह शिकायत बिल्कुल तर्कसंगत नहीं लगती कि महंगाई और भुखमरी के बारे में विपक्षी दल बेबुनियाद भ्रामक प्रचार कर रहे हैं, देश की छवि खराब कर रहे हैं, वगैरह। आज के भारत में वैष्णव जन का उल्लेख कैसे हो सकता है। फिर पीर पराई जानने वाला कैसे बचा रह सकता है? लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय मेंप्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं

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