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शर्मनाक! शर्मनाक!शर्मनाक! बेहद शर्मनाक!

चिंतनीय और विचारणीय भी। झारखंड के इतिहास में इतनी शर्मनाक घटना नहीं घटी थी। यह देख-सुन रोम-रोम सिहर उठा। अभी तक यही कहानी सामने आती थी कि पुलिस की दबिश देख उग्रवादी भाग खड़े हुए। वे डरपोक हैं, इसलिए पीठ पीछे वार करते हैं। लेकिन हाारीबाग से 25 किलोमीटर दूर टाटीझरिया के पास बुधवार को जो कुछ हुआ, वह पूर देश के लिए खतर की घंटी है। दिन के उााले में सुबह साढ़े आठ बजे से दोपहर साढ़े बारह बजे तक वहां न तो राज्य की कोड़ा सरकार का शासन था, न ही केंद्र की मनमोहन सरकार का। उक्त क्षेत्र पर प्रत्यक्ष रूप से माओवादियों ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। सुबह साढ़े आठ बजे लगभग एक हाार की संख्या में माओवादी बीच सड़क पर जमा हो गये। सबके हाथ में हथियार। सड़क का आवागमन उन्होंने रोक दिया। वे खुलेआम उस पुलिस-प्रशासन को वहां आने की चुनौती दे रहे थे, जो तोतारटंत भाषा में अब तक यही दुहराता रहा था कि पुलिस को देख माओवादी भाग खड़े होते हैं। इस बार सैकड़ों आमजन के सामने चार घंटे नक्सली चुनौती देते रहे, लेकिन शूरवीर पुलिस नहीं पहुंची। उनकी चुनौती स्वीकारने में उसे चार घंटे लगे। साढ़े बारह बजे गिरिडीह के एसपी सीआरपीएफ की फौा लिये विष्णुगढ़ की तरफ से सड़क पर आगे बढ़े और इधर हाारीबाग के एसपी प्रवीण सिंह लाव-लश्कर के साथ। सड़क पर माओवादियों को देख उनके पैर ठिठक गये। डेढ़ किलोमीटर दूर पहले खड़े होकर वे हालात का जायजा लेते रहे। उस समय सिर शर्म से झुक गया, जब सीआरपीएफ के जवानों ने आम लोगों की गाड़ियों के शीशे चकनाचूर करना शुरू किया। पुलिस आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। पिटाई के डर से आम लोगों ने अपनी जान हथेली पर लेकर वाहन स्टार्ट किया। लोगों को बेतहाशा भागते देख माओवादियों को दया आयी। उनके सामने दो ही विकल्प थे। आम जन के ऊपर फायरिंग कर रास्ता रोकना या वहां से जंगल लौट जाना। उन्होंने निहत्थे वाहन चालकों और लोगों पर गोलियां नहीं बरसायीं। पुलिस की नामर्दी को कोसते वे जंगल लौट गये। दरअसल, पुलिस ने अपनी जान बचाने के लिए आम लोगों को ढाल बनाया। महाभारत में भीष्म पितामह को परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने एक चाल चली। उन्होंने उनके सामने शिखंडी को खड़ा कर दिया। भीष्म पितामह ने यह प्रतिज्ञा ली थी कि वे महिला या शिखंडी पर वाण नहीं चलायेंगे। श्रीकृष्ण ने उसका फायदा उठाया था। एसा ही कुछ टाटीझरिया के पास हुआ। नक्सली 21 अप्रैल की घटना के खिलाफ सड़क पर उतर थे। उनका कहना था कि उस दिन पुलिस ने निर्दोषों पर फायरिंग कर नक्सली मुठभेड़ की कहानी गढ़ दी थी। पुलिस आम लोगों के सामने वार कर उन्हें मात देना चाहती थी कि वे निर्दोषों पर गोली चलायें, ताकि उन्हीं की भाषा में उन्हें जवाब दिया जा सके। आम लोगों में यह संदेश जाये कि नक्सली सीधे-साधे लोगों को मौत के घाट उतार रहे हैं। चालाक माओवादियों ने पुलिस की इस मंशा को ताड़ लिया, वे वापस जंगल लौट गये। अब पुलिस फिर यही कहानी दुहरा रही है कि उनकी दबिश देख नक्सली भाग गये। वह अपनी वीरता की कहानी गढ़ रही है कि उसने दो नक्सलियों को मार गिराया है। पर यकीन मानिये, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक नक्सली अपनी मर्जी से आये थे, अपनी मर्जी से गये। हां, आवागमन चालू हो जाने के कुछ देर बाद पुलिस जरूर वहां पहुंची। हवा में गोली भी चलायी। लेकिन इससे आगे सब झूठ। शर्मनाक, बेहद शर्मनाक! चिंतनीय और विचारणीय भी। क्या हमारी शूरवीर पुलिस इसी तरह कहानी गढ़ती रहेगी।

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