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यह कैसा संस्कार?

इसे कुसंस्कार कहना चाहिए। भोपाल के समीप एक बाघिन मर गई। उसका अंतिम संस्कार ‘खाल उतार’ कर किया गया। हम शाल ओढ़ाकर सम्मान करते हैं। क़फन में लपेट कर ससम्मान किसी को बिदाई देते हैं। एक राष्ट्रीय पशु को तोपों की सलामी के साथ ‘अलविदा’ करना चाहिए। यहां तो जाते-ााते नंगा कर दिया। क्या खाल खींचने को सम्मान कहते हैं? कम से कम शेर जाति को आदमी की सी फाीहत से बचाना चाहिए। राजा और सियार में अंतर क्या रहा। बाकी के शेरों पर क्या गुजरगी? वे तो अपमान के मार ही ‘मर’ जाएंगे। वैसे भी शेर बाघ संख्या में कम होते जा रहे हैं। हालांकि शेर जंगल के राजा हैं। उनकी रियासत नष्ट की जा रही है। उन्हें अभयारण्य में कैद कर दिया गया है। कौन अभय में है। मनुष्य या वे शेर बाघ? शहर में गली के शेर ज्यादा हो गए हैं। घरों में तो खिलौना कुत्ते हैं। कुल मिलाकर इंसानी आबादी से क्या कम होगी? शेर बाघ का ही अनुपात कुछ गड़बड़ा रहा है। एक तो सरकार से खुराक मिलती है। उन्हें कर्मचारी खा जाते होंगे। अब मरी बाघिन की खाल खींचने में देर नहीं की। क्या वन विभाग उस खाल को नीलाम करगा? नीलामी में ऐसी कौन सी बड़ी राशि मिल जाएगी। भूसा भर कर रखने का नियम नहीं। देखा जाए तो खाल में भूसा भरना भी एक तरह से अपमान हुआ न! वे जब तक जिंदा रहते हैं हम उनसे या तो डरते हैं या उन्हें मारने की फिराक में रहते हैं। मर जाते हैं तो उन्हें कभी तो सजावटी सामान या खिलौने जसा रूप दे दिया जाता है। या कमाई का साधन बना लिया जाता है। कभी-कभी महा कमाई के लिए मार भी दिया जाता है। दिक्कत यही है कि जंगल और हमारा नाता अब महा कमाई का ही रह गया है। यह कमाई जिंदा जानवरों से नहीं, उन्हें मारकर ही होती है। तो भला मर की खाल क्यों नहीं खींची जाएगी।ड्ढr गफूर ‘स्नेही’ड्ढr

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