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गाँवों की ‘आशा’ पर भ्रष्टाचार की नजर

आशा कार्यकतर्््िायों को यूपी के कई जिलों में संस्थागत प्रसव कराने पर छह सौ के बजाए तीन सौ रुपए ही दिए जा रहे हैं। गाँव की सेहत सुधारने के लिए घर का चौका-चूल्हा छोड़ शहर-कस्बे तक दौड़ लगाने वाली आशा बहुएँ हैरान हैं। हक मार जाने से आजिज आशा कार्यकतर्््िायों ने कुछ जगहों पर जननी सुरक्षा योजना के जरिए प्रसव कराने वाली महिलाओं को मिलने वाली राशि में हिस्सा माँगना शुरू कर दिया है। निश्चित मानदेय की माँग को लिए वे पहले ही जिला कचहरी से विधानभवन तक धरने दे रही हैं।ड्ढr राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत जननी सुरक्षा योजना को प्राइवेट नर्सिग होम व निजी अस्पतालों में लागू करने की तैयारी चल रही है। जबकि सरकारी अस्पतालों में ही स्थिति ठीक नहीं हैं। शिकायतें कानपुर, सीतापुर और लखनऊ के ग्रामीण इलाकों में काम कर रही आशाओं से बात की तो गड़बड़ियों की बात सही निकली। आजमगढ़ जिले अजमतगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भ्रष्टाचार की शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय में की गई है। शिकायत के साथ उन चेकों की प्रतिलिपियाँ भी लगाई गईं हैं, जिनमें छह सौ के बजाए तीन सौ रुपए ही दर्ज है।ड्ढr हेल्थ-वॉच संस्था की प्रवक्ता ने बताया कि यहाँ आशा बहुएँ संस्थागत प्रसव कराने वाली औरतों को मिलने वाली 14 सौ रुपए की राशि में से सात सौ रुपए जबरन ले रही हैं। इस संस्था ने आशा को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि पर बांदा, गोरखपुर, चंदौली, नौगढ़,आजमगढ़ और मिर्जापुर आदि जिलों में सव्रेक्षण कराया है। लखनऊ के गोसाईगंज की एक आशा बहू के पति ने बताया कि 12 दिनों की विशेष ट्रेनिंग में 1440 रुपए मिलते हैं पर अधिकारी सिर्फ आठ सौ रुपए देने की बात कर रहे हैं। इस आशा बहू ने फिलहाल पैसा लेने से ही मना कर दिया है। जबकि आगरा व आसपास में आशा कार्यकतर्््िायों को लंबे इंतजार के बाद ही पैसा मिल पाता है। जिला महिला अस्पताल में राशि लेने वालों की लंबी सूची है। बार-बार सीएमओ से गुहार लगानी पड़ती है। यही कारण है कि एक वर्ष में लगभग 30 फीसदी आशा कार्यकतर्््िायों ने काम छोड़ दिया। एक डिलीवरी के लिए छह सौ रुपए लेने में दो से तीन महीने का वक्त लग रहा है। शिशु को बीसीजी का टीका लगने के बाद सौ रुपए देने का नियम है। लेडीलायल अस्पताल में डिलीवरी करवाने के बाद भी महीनों से पैसे का इंतजार है।ं

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