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धुर वाम और धुर दक्षिणपंथ की उध्वस्त धर्मशालाएँ

‘‘यह सही है कि स्टालिन-युग को बीते काफी अरसा हो गया, लेकिन उसकी यादें, उसकी परंपराएँ और आदतें अभी भी लोगों के मनों में गहर से बसी हुई हैं, और एक लम्बे अरसे तक उनको प्रभावित करती रहेंगी। कितने लोग (या उनके दोस्त या रिश्तेदार) तब सिर्फ इसलिए दर-ब-दर किए गए, कि उन्होंने कभी कुछ सवाल पूछ लिए थे, कुछ असहमतियॉं जता दी थीं।.. ऐसी सयता, जो सवाल नहीं पूछती, जिसमें चिन्ता, आलोचना और एकल खोज की बजाए सिर्फ सघन सरकारी पूछताछ का ही वर्चस्व होता है,..एक लकवाग्रस्त, सुन्न सयता बन जाती है। क्रेमलिन के शासक शायद यही चाहते भी थे। एक खामोश, भय-ाड़ित राज-समाज पर शासन करना सबसे आसान होता है।’’..ड्ढr (इंपीरियम- रिचर्ड कापुसिंस्की) प्रसिद्ध पोलिश पत्रकार की यह पंक्ितयॉं उस स्टालिन वादी साम्यवाद के युग को साकार करती हैं, जिसकी एक लंबी विचलित करने वाली झॉंकी सोवियत संघ ने देखी थी, और एक लघु (तर) झलक हाल के विश्वास-मत सत्र के दौरान भारत को माकपा ने पुन: दिखाई है। कापुसिंस्की सही कहते हैं, कि उस युग की जड़ें बड़ी गहरी हैं। लिहाजा सोवियत संघ के विघटन के अठारह बरस बाद इधर रूस में फिर स्टालिन की पूजा का एक नया दौर शुरू हो रहा है। खबर है, कि जल्द ही रूसी आर्थोडॉक्स चर्च स्टालिन को एक संत घोषित कर देगा। नेतृत्व की अंधपूजा तथा वैचारिक असहमति के प्रति असहिष्णुता के मुद्दों पर अंत में धुर-दक्षिणपंथी दलों में एक विलक्षण साम्य दिखने लगता है। साम्यवादी मानते हैं, कि भारत में जनक्रांति लाना और संघ परिवार के लोग मानते हैं हिन्दू राष्ट्र स्थापना ही पार्टी का चरम प्राप्य है, और उसे लाने के लिए नेतृत्व द्वारा हर तरह का आत्म (और पर) पीडन भी जायज तथा जरूरी बनता है। हालांकि यह भी विचारणीय है, कि स्वाधीन भारत के वाम नेताओं की जो पंक्ित पोलित ब्यूरो चला रही है, वह योरोप या चीन के फासियों अथवा साम्यवादियों की तरह गुफाओं-ांगलों में छुपने को बाध्य नहीं हुई। न ही उन्होंने वैसी कड़ी कुर्बानी और आत्मदमन का दौर देखा है, जसा योरोप अथवा चीन के नेताओं ने देखा था। भाजपा के वर्तमान नेता भी गोलवलकर या सावरकर के जसे कष्टों से नहीं गुजर हैं। फिर भी दोनों में से कोई पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि उनकी पार्टी समसामयिक या उदारवादी बने। भारत के वर्तमान संविधान को लेकर दोनों को आत्यंतिक दिक्कतें हैं।ड्ढr सच तो यह है, कि भाजपा के दर्शन के उलट धर्म के आधार पर विभाजन कराने वाले देश गृहयुद्धों में बाद को भी लड़ते-मरते रहते हैं। और वाम दर्शन के विपरीत तोड़ने वाली गरीबी और कुचलने वाले संघर्ष से भरी जिंदगी से जब सामान्य किसान और मजदूर निजात पाते हैं, तो वे साम्यवादी कम्यून की साझा राह नहीं पकड़ते। औसतन कष्ट के बाद मनुष्य आराम और चैन भरी जिंदगी बिताने के ही इच्छुक होते हैं। और उसमें वे धर्म और पारंपरिक रीति-रिवाजों का उतना ही समावेश चाहते हैं जितना उनकी स्वार्थपूर्ति के आड़े नहीं आता। हरियाणा में पंजाब में जब किसान खेती से या जमीन बेचकर अमीर बने तो उन्होंने क्या किया? उन्होंने बड़ी-बड़ी आधुनिक कोठियॉं बनाईं, मर्सिडीा और स्कोंडा कारं खरीद लीं, बच्चों को कानवेंट स्कूलों में ोजा और खूब जगरमगर ढंग से हेलीकॉप्टर से बेटे-बेटियों की बरातें लाने- रवाना करने लगे। इसी तरह वामपंथी बनने के बाद बंगाल के भद्रलोक ने जनभाषा का साम्यवादी राज नहीं बनाया। यूनियनों पोलित ब्यूरो से स्त्रियों को दूर रखा, अंग्रेजी नहीं हटाई। उनके बेटे-बेटियॉं पढ़ने को विदेश जाते रहे और वहीं बस भी गए। और (ौसा कि नीरद चौधरी से झुम्पा लहरी तक का साहित्य बताता है) अधिकार और सुविधा सम्पन्न परदेसी नागरिक बन कर वे सुखी हैं। फिर भी वाम नेता पूँजीवादी पश्चिम और भाजपाई म्लेच्छों के खिलाफ चिल्लाते रहते हैं। अगर उन्हें यकीन है कि उनका दर्शन सही है, तो वे सत्ता में होकर भी बात-बात में सड़कों पर आकर इतना चिल्लाते क्यों हैं? चक्काजाम और पटरी-ााम को प्रोत्साहन देकर खुद अपने ही शासित राज्य की जनता के प्राण अकच्छ क्यों करवाते हैं? जनता की असहमति के प्रति धुर वाम तथा धुर दक्षिणपंथी एक सरीखे असहिष्णु हैं। कड़े प्रश्न उठाने पर भाजपा ने चट उमा भारती और गोविंदाचार्य को बाहर का रास्ता दिखा दिया, और माकपा ने अपनी ही पार्टी के एक अत्यंत वरिष्ठ और सम्मानित सदस्य को स्पीकर के संवैधानिक पद पर आसीन होने के बाद परंपरा के अनुरूप तटस्थता बरतने पर अपने पार्टी संविधान का हवाला देकर पार्टी से बाहर निकाल डाला। दोनों जगह पार्टी प्रमुख अलबत्ता यह कहते रहे कि उन्होंने यह काम बड़े दु:ख से किया है, लेकिन पार्टी के अनुशासन के मद्देनजर यह जरूरी था। परखने पर असहमति या जरूरी बदलाव को लेकर वाम और दक्षिणपंथ दोनों की ही ऐसी अनुशासनप्रियता मूलत: अवैज्ञानिक और वैयक्ितक आग्रहों से प्रेरित निकलती है। और एक संघीय गणराज्य में ऐसे पूर्वाग्रही फितूरों के लिए कोई सम्मानजनक जगह नहीं होनी चाहिए। शायद इसीलिए वामदलों का आधार लगातार सिकुड़ रहा है। और हर आम चुनाव में अशरीरी प्रेतों की तरह चुनाव के बाद भौतिक सत्ता विश्व में प्रवेश कर पाने के लिए वे किसी बूज्र्वा पार्टी की खोज किया करते हैं। कभी यह शरीर कांग्रेस का होता है, कभी सपा या भाजपा का। और इस बार बसपा में उन्हें राष्ट्रीयड्ढr संभावनाएॅं दिखने लगी हैं। मायावती जी सावधान रहें।ड्ढr देखा जाए तो वामदलों और संघ परिवार, दोनों को कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र की सहा उदारवादी समन्वयवादिता और सर्वधर्मसमभाव के दर्शन से परहेा है। शायद इसीलिए इस बार वामदल गैरकांग्रेसी गठाोड़ के लिए बसपा की मदद से एक साम्यवाद प्रेरित तीसरा मोर्चा रचना चाहते हैं। बसपा ने पूँजीवाद और मनुवाद के तमाम वर्तमान आलस्य और भ्रष्टताओं को सप्रेम अंगीकार करके ही लगातार चुनावी बढ़त हासिल की है। फिर भी वामदलों को यह पक्का भरोसा है, कि मायावती को प्रधानमंत्री का राजतिलक करके वे एक बार फिर एक ‘पावर बिहाइंड द थ्रोन’ बन कर बसपा की मार्फत किसान-मजदूर के लिए क्रांति ले आएंगे। यह तो ऐसा ही विश्वास हुआ, कि आप अंतरिक्षयात्री का ‘नासा’ वाला सूट पहन कर एक चर्रखचूॅं बैलगाड़ी में चढ़ जाएॅं, और कहें कि बस, मीता हीरामन, देखना हमार प्रताप से अभी-अभी यह बैलगाड़ी एक उड़नतश्तरी बन कर अंतरिक्ष की उड़ान भरने लगेगी।ड्ढr चौबीस घण्टे के सैटेलाइट टेलीविजन प्रसारण और ग्लोबल बाजारों के युग में अतिवाद या भीड़तंत्र के लिए कोई गुप्त हॉट-हाउस नहीं बचे हैं, और अतिवादी हॉट-हाउस के संरक्षण के बिना असहमति की बाढ़ से धुर वामपंथ या धुर दक्षिणपंथ दोनों ही बहुत दिन बच नहीं पाएंगे। प्रमाण अनेक हैं। गई सदी के दौरान एशियाई वामपंथ के नमूने के बतौर प्रस्तुत किए जाते रहे सार अरब देश आज कट्टरपंथी धार्मिक चोगा पहने बैठे हैं। अफ्रीका या द.एशिया में सुकर्णो, भु्ट्टो परिवार, अंक्रूमा, भंडारनायके, बेन बेल्ला किसका साम्यवाद आज बचा है? सोवियत संघ के विघटन के बाद पुतिन युगीन रूस और हू के पूॅंजीवादी चीन के संदर्भ में पूछें, वामपंथी होने का क्या कोई मतलब आज रह गया है? जब ध्रुवों में चुम्बकीय ताकत ही न रही, तो लोहे की बिखरी हुइ किर्चो की क्या सार्थकता हो सकती है?ं

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