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डर नहीं

डर नहींड्ढr चौबे बाबा को इस बार अहसास हुआ कि भगवान सबकुछ भले के लिए करते हैं। कैसा खराब गुजरा था पिछला साल। बादल देखकर ही भागलपुर विदा हो जाते थे। इस बार बमबम हैं। झेलें भोला बाबू। ऐन मौके पर छोटे सरकार ने भी बाबा को याद दिलाया कि विभाग बदल कर आप पर कितना बड़ा अहसान किया गया। जरा सोचिए और गुस्सा थूक दीजिए। बाबा ने अहसान माना। तभी तो सुल्तानगंज में एक मंच पर इकट्ठा हुए। छोटे सरकार ने बाबा को यह भी याद दिलाया कि पिछली बरसात में आप पर कितने काटरून बने थे। बाबा मुस्करा कर रह गए।ड्ढr ड्ढr शिक्षाड्ढr माना जाता है कि उनके विभाग में पढ़े-लिखे लोगों की भरमार है। मगर इन्हीं पढ़े-लिखे लोगों की सलाह ने मंत्रीजी की लुटिया डूबो दी। तबादले का दौर खत्म होने के बाद जो हाथ आया, वह इस विभाग के लिहाज से बेहद कम माना गया। वजह तलाशी गई। विशेषज्ञ जुटे। सबने अपनी राय दी। विशेषज्ञ इस मुद्दे पर एकमत हुए कि अधिक रट के कारण तबाही हुई। भाई लोगों ने महंगाई का ख्याल नहीं रखा। खर, इस घटना से मंत्रीजी और उनके करिन्दों को यही शिक्षा मिली कि तबादले का रट बाजार भाव देखकर ही तय करना चाहिए।ड्ढr ड्ढr सवा सेरड्ढr साहब अफसर हैं। पर, दरबार लगाने का भी शौक है। लोग कम पड़ें तो दरबारी की भूमिका में उनके कर्मचारी आ जाते हैं। उन्हें कुल जमा तीन कर्मचारी मिले हैं। संयोग देखिए कि तीनों बहर हैं। साहब पंचम स्वर में बोलते हैं तब कहीं जाकर एक कर्मचारी सुन पाता है। दो पर तो पंचम स्वर का भी असर नहीं पड़ता है। एक दिन की बात है। साहब ने एक कर्मचारी से कहा कि अमुक फाइल ले आओ। कर्मचारी मुंह बाए खड़ा था। साहब को बुरा लगा। तबतक दूसर कर्मचारी ने उस्तादी दिखा दी-सर, चाय खत्म हो गई है। बाहर से ला दें?ड्ढr ड्ढr राष्ट्रहितड्ढr मामला राष्ट्रहित का था, सांसद महोदय कम में मान गए। बारगेनिंग करने गए यूपीए के घटक दल के एक नेता को सांसद ने दिल की बात कही। बोले-हमें रुपये से मतलब नहीं है। बस, अगले चुनाव में टिकट की गारंटी चाहिए। टिकट की गारंटी मिल गई। वह लालटेन छाप से नहीं लड़ेंगे। पंजा छाप चाहिए। बात तय हो गई। तब उन्हें राष्ट्रहित का भी ख्याल आया। इशार में कहा कि राष्ट्रहित के फंड में अपना हिस्सा भी बनता है। खबर है कि ऐन वक्त ही उन्हें राष्ट्रहित का हिस्सा भी मिल गया। यह अलग बात है कि राष्ट्रहित में उनकी मामूली भागीदारी रही। पूरा एक भी नहीं मिला।

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  • Web Title: राजदरबारच