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दो टूक

योजनाएं-परियोजनाएं सरामीं पर उतरं तो कैसे? समस्या जमीन की है। नयी राजधानी का ड्रीम प्रोजेक्ट हो या फिर यूनिवर्सिटी के नये कैंपस का निर्माण, पावर प्लांट की परियोजना हो या नयी रल लाइन बिछाने का मामला। विकास के पहिये हर जगह रुके-थमे हैं। बड़ी परियोजनाएं, जिनके लिए सैकड़ों एकड़ जमीन की दरकार है-उनकी बात छोड़ भी दें तो राज्य में 32 छोटे पावर सबस्टेशनों तक का निर्माण सिर्फ एकड़-दो एकड़ जमीन की खातिर रुका पड़ा है। दिलचस्प है कि विधायकों-मंत्रियों और अफसरों की कॉलोनी बसाने के लिए 80-0 एकड़ जमीन चुटकी बजाते हासिल कर ली जा रही है। निजी हित की योजनाओं के लिए हुक्मरान जिस तरह एड़ी-चोटी एक कर देते हैं, काश ! सार्वजनिक योजनाओं के लिए वैसी ही इच्छाशक्ित दिखाते।

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