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रामसेतु: करुणानिधि को क्यों प्रिय है सेतुसमुद्रम

रामसेतु विवाद पर पर्यावरणविद आर. के. पचौरी की अध्यक्षता में छह सदस्यों वाली समिति बनाना सार्थक कदम है। वे इस साल का क्लाइमेट प्रोटेक्शन अवार्ड भी जीत चुके हैं। लेकिन संप्रग सरकार इस मसले के एक ऐसे हल की तलाश में है जिससे बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत न हों। पचौरी समिति से कहा गया है कि वह सेतु समुद्रम परियोजना का अध्ययन कर और अगर इसकी वजह से ‘रामसेतु’ को कोई नुकसानपहुंचता है तो वैकल्पिक मार्ग सुझाए। यह तरीका सरकार के उस रवैये से एकदम अलग है जो उसने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में अपनाया था। तब सरकार ने कहा कि भगवान राम का कोई अस्तित्व था ही नहीं। एक तो केंद्र की यह टिप्पणी थी और दूसर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने यह कह डाला था कि राम ने इांीनियरिंग की डिग्री कहां से ली थी। इन बातों से हिन्दू ही नहीं कांग्रेस के भी कई लोग भड़क उठे थे। इस पर कांग्रेस को यह सफाई देनी पड़ी थी कि मुख्यमंत्री का यह बयान उनकी पार्टी की सोच हो सकती है संप्रग की नहीं। तब कई लोगों को लगा था कि उनके बयान का असर चुनाव में कांग्रेस को झेलना पड़ सकता है।ड्ढr सरकार के भीतर से ही दबाव इतना ज्यादा था कि केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से अपना विवादास्पद हलफनामा वापस लेना पड़ा था। इस बार सरकार ने जो हलफनामा दिया उसमें पद्मपुराण और कम्ब रामायण के हवाले से कहा गया कि भगवान राम ने लंका से लौटने के बाद उस सेतु को तोड़ दिया था। वैसे यह तर्क राम सेतु से जुड़ी भावनाओं को तो स्वीकारता है, लेकिन इसमें गड़बड़ी यह है कि यह रामयण के उन रूपों पर निर्भर है जो कम ज्ञात हैं और इस चक्कर में यह तर्क इसके लोकप्रिय रूपों को नजरंदाज कर देता है। फिर यह हलफनामा केंद्र सरकार के विश्वासमत जीतने के अगले ही दिन पेश हुआ। इससे यह शक पैदा हुआ कि यह काम द्रमुक को खुश करने के लिए किया गया है। द्रमुक इस परियोजना को हर हाल में जमीन पर उतारना चाहती है। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ऐसी परियोजना के लिए क्यों दिन-रात एक किए हुए है जिसे लागू करने का नतीजा होगा रामसेतु का नष्ट हो जाना? और यह जिद भी तब है जब सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस परियोजना को लेकर चिंता व्यक्त की है। परियोजना के पर्यावरण व आर्थिक पहलुओं पर भी कई सवाल खड़े हैं। फिर क्यों करुणानिधि जसे तजुर्बेकार नेता बहुसंख्यक हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की कीमत पर इसे सिर चढ़ाने पर तुले हुए हैं?ड्ढr करुणानिधि के लिए सेतुसमुद्रम सिर्फ एक नहर परियोजना भर नहीं है, जो खाड़ी से रास्ता बनाकर देश के पूर्वी और पश्चिमी समुद्र तटों को जोड़ती है। इसमें वह सिद्धांत है जो दसकों से उनके दिल को छूता रहा है। वे इस देश में द्राविड़ आंदोलन को आकार देने वाले नेताओं में रहे हैं और इस हैसियत से वे राम को हर तरह की क्षति पहुंचाना चाहते हैं। द्राविड़ दर्शन के हिसाब से राम मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हैं, बल्कि वे उत्तर भारतीय संस्कृत बोलने वाले आर्य लोगों के प्रतीक हैं। वे मानते हैं कि रामायण और कुछ नहीं आर्यो की द्राविड़ पर विजय का महिमामंडन है।ड्ढr अतीत में द्राविड़ आंदोलन ने रामायण की पुनर्रचना करने की कोशिश भी की जिसमें रावण को नायक और राम को खलनायक बनाया गया था। इस साहित्य में राम एक हमलावर हैं और रावण वह है जो द्राविड़ अस्मिता की रक्षा के लिए वीरतापूर्वक लड़ता है। अब जब करुणानिधि का राजनैतिक कैरियर उतार पर है, वे राम सेतु को नष्ट करके अपना नाम द्राविड़ इतिहास में ऐसे शख्स के तौर पर दर्ज करा लें जिसने अतीत की गलती का बदला ले लिया।ड्ढr सच तो यह है कि सितंबर में जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पहला हलफनामा पेश किया था, उसी के बाद करुणानिधि ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि वे ऐसी किसी भी ताकत से निपटने के लिए तैयार हैं, जो हिन्दू भावनाओं की बात करती हो। उन्होंने चेन्नई से इस बाबत एक बयान भी जारी किया था जिसमें कहा गया था कि जो सत्ता में उन्हें अपना नजरिया दूसरों पर थोपने से बाज आना चाहिए। जाहिर है कि वे उन आरोपों का जवाब दे रहे थे जिनमें यह कहा गया था कि उन्होंने राम विरोधी बयान देकर हिन्दुओं की भावनाओं को आहत किया है।ड्ढr करुणानिधि ने पूर विस्तार के साथ यह भी बताया था कि उन्होंने राज्य भर के मंदिरों में होने वाले अनुष्ठानों में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। अपने पूर बयान मेंड्ढr उन्होंने रामसेतु को एड्म्स ब्रिज कहा। साथ ही यह भी कहा कि अगर परियोजना का नामकरण राम के नाम पर होता है तो उन्हें कोई एतराज नहीं है। नए नाम का उनका सुझाव था- सेतु राम।ड्ढr ं

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