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तलाक : सिर्फ टूट नहीं, जुड़ भी रहा है समाज

तलाक की बढ़ती दर आजकल चिन्ता और चर्चा का मुद्दा बनी हुई है। दिल्ली की बात करें तो यहां औसतन 1,36,000 शादियां हर साल हो रही हैं और दूसरी तरफ हर वर्ष लगभग 10 हजार जोड़े तलाक के लिए कोर्ट पहुंच रहे हैं। कुछ लोग तलाक के बजाय आपसी सहमति से सेपरेशन ले लेते हैं और अलग रहने लगते हैं। ऐसी उभरती स्थिति के ‘परिवार, बच्चों और समाज के लिए विपरीत परिणामों’ को देखते हुए दिल्ली महिला आयोग ने हाल ही में विवाहपूर्व परामर्श केन्द्र की स्थापना भी की है। इससे पहले भी सरकार की तरफ से चलने वाले परिवार परामर्श केन्द्रों पर लड़के-लड़कियों के साथ प्रीमैरिटल कौन्सलिंग अर्थात विवाहपूर्व सलाह मशविरे पर जोर था। इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि कई तलाक के पीछे ‘वजह बहुत मामूली होती है’ यह योजना बनी है कि शादी के बन्धन में बन्धने वाले ऐसे जोड़ों को परामर्श देन के लिए विशेषज्ञ सलाहकारों की टीम के साथ मोबाइल वैन तथा हेल्पलाइन फोन नम्बर की व्यवस्था भी की गई है। तलाक के दर 1ी तुलना में 2001 में 15 फीसदी बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले दिनों तलाक दर पर चिन्ता व्यक्त की है। एक मामल की सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी भी की है। उसने इस बढ़ोतरी के लिए 50 के दशक में बने हिन्दू विवाह अधिनियम को जिम्मेदार ठहराया है। तलाक के कारण बच्चों को जो झेलना पड़ता है उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के सरोकार जायज हो सकते हैं, लकिन इसके चलते हिन्दू विवाह अधिनियम की एक असन्तुलित छवि भी बनती है। दरअसल हकीकत यही है कि हिन्दू विवाह अधिनियम ने पहली बार सीमित अर्थों में ही सही हिन्दू महिलाओं को सम्पत्ति में हिस्सेदारी और एकपत्नी विवाह प्रथा जैसे अधिकार दिए थे तथा सम्बन्ध विच्छेद को मुमकिन बनाया था। वे लोग जो आजादीपूर्व भारतीय जीवन से परिचित होंगे वे बता सकते हैं कि विवाहों की संख्या पर कोई पाबन्दी हिन्दुओं पर नहीं थी। एक रईस हिन्दू कई-कई शादी कर सकता था। क्या ऐसी बहुविवाह प्रथा किसी स्त्री के लिए सम्मानजनक हो सकती थी! तलाक के मामलों में बढ़ोतरी के सन्दर्भ में यह अर्थ निकालना सही नहीं होगा कि लोग पहले तलाक नहीं लेना चाहते थे, बल्कि यह कहना अधिक सही है कि पहले जैसा माहौल था जैसी समझ थी उसमें तलाक लेना आसान नहीं था, विकल्प खुले नहीं थे इसलिए असहमतियों को दबा देने या बर्दाश्त कर लेन के अलावा कोई उपाय नहीं था। तलाक को किस डिग्री के सामाजिक संकट के रूप में पेश किया जाए इस पर लोगों की भिन्न-भिन्न राय होगी! क्या पहल की परम्परा को आदर्श रूप में पेश किया जाए या आज के परिवेश के अनुकूल स्वयं को तैयार किया जाए। इसके कारण और समाधान क्या हो यह विश्लेषण का विषय हो सकता है। लेकिन तलाक न सिर्फ हमारे देश में बल्कि पूरे विश्व में एक परिघटना (फेनोमेना) है। हम हाल ही में स्पेन से आई एक रिपोर्ट के उदाहरण से इस बात को समझ सकते हैं। स्पेन में नई सरकार बनन के बाद 2005 में तलाक के कानून को लचीला बना दिया गया और अगर दो व्यक्ित यदि अलग रहना चाहें तो उन्हे यह अधिकार दिया गया । कानून बनन के अगले ही साल तलाक के मामलों मे 74़3 फीसदी की बढ़ोतरी पाई गई। इसके पहल की कैथोलिक कॉन्जर्वेर्टिव पार्टी की सरकार में तलाक लेना मुश्किल था, क्योंकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता था। लकिन लोगों ने इसमें से रास्ता निकाल लिया था। व कानूनन अलग नही होते थे लकिन व्यवहारत: हो जाते थे । इस पद्धति को स्पॅनिश तलाक कहा जाता था । रूढ़िवादी संगठनों ने स्पेन के नये बिल का विरोध किया। वहां की एक वकील लुईस न कहा कि तलाक के मामले बढ़ने के लिए नया कानून जिम्मेदार नहीं है। उसने तो उन जोड़ियों के लिए इस प्रक्रिया को आसान बना दिया जो व्यवहार में पहले से ही अलग हो चुके थे। पहले एक शादी टूटन के बाद आम तौर पर दोबारा शादी नहीं होती थी, लकिन आज स्त्री-पुरुष दोनों का ही फिर से दूसरी शादी हो जाना सामान्य होता जा रहा है। इसके बावजूद तलाक की संख्या की जितनी चर्चा होती है उतनी पुन: शादी पर बात नहीं होती। इस पर कोई सर्वेक्षण रिपोर्ट भी अभी तक देखन को नहीं मिली, लकिन पहल की तुलना में यह बदलाव आया है।ड्ढr लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से जुड़ी हैं

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