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हर फन वाले

ाब से डेमोक्रेसी की पिटारी खुली है, तब से खास नागों और आम नागरिकों के इस देश में राजा परीक्षित के सिंहासन से लेकर आज की कुर्सी तक तक्षक, भक्षक और रक्षक स्नेक्स की अनेकानेक प्रजातियां लिपटी-चिपटी मिलती हैं। कहा जाता है कि पाप, अत्याचार और पॉल्यूशन की मारी यह धरती कब की रसातल को चली गई होती, अगर इसे शेषनाग ने अपने सिर पर न उठा रखा होता। अब अपने ये शेषनाग जी कोई बिल-धारी जीव तो हैं नहीं कि उनको सरकारी सुविधाओं की कटोरी में दूध पिलाकर या फिर व्यवस्था की बीन बजाकर नचा-वचा लिया जाए! वे पब्लिक को फ़न पर रखते हैं, उसके साथ ‘फन’ नहीं करते। सो उनकी कृपा से अभी भी बहुत कुछ सेफ है। सांपों से तो भगवान भी दूर नहीं हैं। विष्णु के पास शेष शय्या का डबल बेड है। शंकर के पास स्नेक्स का नेकलेस है। श्री कृष्ण कालिया के फ़न पर ट्विस्ट करते हैं। फिर आम जनता की क्या बिसात है? ये नाग-सांप तो उसके इर्द-गिर्द हैं। नागपंचमी को इनका वार्षिकोत्सव होता है। सांपों का अपना कोई स्वनिर्मित बिल नहीं होता। व कमजोर चूहों के बिलों पर अवैध कब्जा जमाते हुए सर्वत्र देखे जा सकते हैं। कलियुग में संघ की शक्ित और नागों की भक्ित का अपना महत्व है। इनकी पूजा-अर्चना का विधिवत प्रावधान है। मगर इनके काट का कोई समाधान नहीं है। कहा जाता है कि जब तक नाथा न जाए, तभी तक नाग और सांप अलग दिखलाई देते हैं। नाथ दिए जाने पर एक जैसे हो जाते हैं। जैसे नागनाथ, वैसे सांपनाथ। एक दास कवि हुए, मलूकदास। उन्होंने सांपों और चिड़ियों की वर्क स्टाइल का गहन शोध अध्ययन किया था। आफ्टर दैट, अपनी रिपोर्ट की समरी को दो लाइनों में पेश करते हुए यह कहा था कि उन्हें सारे सांपों की तो जानकारी नहीं है, लकिन इनमें जो अजगर नामधारी सांप हैं, वे किसी भी प्रकार की चाकरी नहीं करते और पंछी भी कोई काम नहीं करते। गोया ये दोनों ही सुविधाभोगी वर्ग से आते हैं। एक पसरे-पसरे अपनी व्यवस्था पर विचार करता है और जुगाड़ जमाता है, दूसरा विचरण करता है, तब उसकी व्यवस्था हो पाती है। लगता है तत्कालीन सरकार ने इस जॉब रिपोर्ट को ही बेस बनाकर अजगरों को शासन तथा पंछियों को प्रशासन नामक रोजगार की तुरही थमा दी होगी। पंछी अपने हिस्स का दाना-पानी चुग कर उड़ गए होंगे। अजगरों ने अपने शिकार निगले होंगे और ख़रामा-ख़रामा टेढ़े-टेढ़े निकल लिए होंगे। इन दोनों की कुंडली कहीं देश की कुंडली पर भारी न पड़ जाए, सावधान !

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