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हर समय डूबे रहते बाढ़ के ख्यालों में

बाढ़ उनके ख्यालों से जाती ही नहीं। सोते-बैठते, खाते-खेलते और पढ़ने के दौरान बाढ़ जसे उनके सामने खड़ी हो जाती है। ये वे बच्चे हैं जिन्हें बाढ़ग्रस्त गांवों से लाकर मधेपुरा जिले के सिंघेश्वरस्थान, गम्हरिया और सहरसा के मेगा शिविरों में रखा गया है। सरकार ने शिविर में उनके लिए न केवल स्कूल खोला है बल्कि उन्हें ड्रेस और किताबें भी दी हैं। पढ़ाने के लिए कई शिक्षकों के अलावा स्वयंसेवकों को रखा गया है। लेकिन बच्चे हमेशा बाढ़ के बार में सोचते हैं। वे इससे डरते नहीं बल्कि अगली बार इससे बचने को लेकर बात करते हैं। सहरसा मेगा शिविर में पढ़ाने वाले एक शिक्षक बताते हैं कि इन बच्चों को जब भी कुछ लिखने को कहा जाता है, वे बाढ़ के बार में लिखने लगते हैं। कुमारखंड के मंशी कुमार ने अपनी कापी में लिखा है- ‘गांव में इस बार बाढ़ आ गई।ड्ढr ड्ढr हमलोग किसी तरह बच गए और कैम्प में आ गए लेकिन हमारी बकरी वहीं रह गई।’ सुधाकर लिखता है- ‘बाढ़ आई तो हमलोगों को बहुत परशानी हुई। खाने के लिए भी कुछ नहीं था। अब हमलोग कैम्प में हैं तो खाने के लिए मिल रहा है।’ इन लड़कों के लेख बिहार शिक्षा परियोजना की पत्रिका में छपेंगे। सिंघेश्वरस्थान के कैम्प के स्कूल में शिक्षिका मधु कुमारी पढ़ा रही है-‘देख मेरी गुड़िया कितनी सुन्दर, लाल-लाल फ्राक है, पढ़ मेरी गुड़िया।’ बिरैली की नीतू कुमारी चुप है। कुछ नहीं बोल रही है। इस संवाददाता के पूछने पर बताती है- हम्मर गुड़िया घर छूट गैल छै। बाढ़ में बह गइल होईतई? गम्हरिया के कैम्प में दूसरी कक्षा में पढ़ने वाला मदन कुमार पढ़ रहा है-‘पूरब से पश्चिम को जाएं, उत्तर से दक्षिण को जाएं। घूम-घाम कर घर आ जाएं, मां को अपनी बात बताएं।’ पढ़ते-पढ़ते रुकता है और बगल में बैठे अपने साथी से पूछता है- ‘हमू सब घूम-घाम के अप्पन घर पहुंचबै न?’

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