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ब्लॉग वार्ता : कपोत्सव के जुनून में ब्लॉगर

भारत ने विश्व कप क्या जीता, दर्शक सहित ब्लॉगर मन भी कप को लेकर उत्सव मनाने में डूबे हैं। इस प्रक्रिया को मैंने कपोत्सव नाम दिया है, जो राष्ट्रीय स्तर पर चेतना के हर कोने में मनाया जा रहा है। कई मित्रों ने कहा कि वे निगेटिव फील नहीं कर पा रहे हैं। इतना पॉजिटिव हो गए हैं कि देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। क्रिकेट प्रेमियों का यह जुनून स्वाभाविक है। रश्मि प्रभा तो कविता में डूब गईं। 

http://urvija.parikalpanaa.com  पर वह लिखती हैं कि यह है अपने देश की आन-बान और शान, जहां पत्थर में होते हैं भगवान, वेद ऋचाओं से नि:सृत होते हैं गान, मेरा भारत महान। क्या होगा हाला का नशा, क्या मद में होगी मधुशाला। पटना डीपीएस की रश्मि प्रभा विश्व कप की जीत से खुश होकर वंदनवार गाने लगी हैं।

http://kabaadkhaana.blogspot.com पर पत्रकार शिव प्रसाद जोशी का लेख है। शिव लिखते हैं कि क्रिकेट में कला का रिवाइवल हुआ है, लेकिन उसके साथ-साथ अन्य कलाएं भी लिपट आई हैं। कला पर नीलामी की चोट करने वाली कला। बाजार के लिए भले ही ये क्षण मुंहमांगी मुरादें पूरी हो जाने के हैं, लेकिन क्रिकेट के भावी खिलाड़ियों, देश के विभिन्न शहरों, गलियों, मोहल्लों में क्रिकेट को अपना लक्ष्य बना चुके युवाओं के लिए तो यह एक बोनस की घड़ी है। जब समस्त दावतें, हुंकार, नारे और चिल्लाहटें खामोश हो जाएंगी, जब सड़कों पर उड़ता गदरेगुबार बैठ जाएगा, जब लोग अपने-अपने यथार्थ में लौटेंगे, जब उन्हें अचानक खुशी के पलों के बीत जाने के बाद का खालीपन, सन्नाटा और छलावा महसूस होने लगेगा, तब कुछ सवाल बनेंगे। कुछ तो सवाल बनेंगे ही।

प्रवीण शाह ने तो अपने ब्लॉग पर एक अलग ही थ्योरी की रचना कर दी है। http://praveenshah.blogspot.com पर वह लिखते हैं कि सच पूछिए तो मैं उन कुछ खुशनसीबों में से हूं, जो अपनी उम्र साल में नहीं गिनते, बल्कि मैं अपनी उम्र बताता हूं फुटबॉल और क्रिकेट के विश्व कपों की संख्या से, जिनका मैंने आनंद लिया है अब तक। इस लिहाज से अब मैं आठ विश्व कप पुराना हो चुका हूं। धोनी की बल्लेबाजी पर लिखते हुए प्रवीण शाह रीतिकाल के कवि की तरह बर्ताव करते हैं। लिखते हैं कि ऐसा कहीं लग ही नहीं रहा था कि आप विश्व कप के फाइनल में एक खतरनाक गेंदबाजी आक्रमण के विरुद्ध एक मुश्किल लक्ष्य का पीछा करते भारतीय कप्तान को देख रहे हैं। लग रहा था कि शांत रमणीक वन में जैसे कोई साधक तपस्या कर रहा हो।

हर तरफ जीतने की खुशी में कपोत्सव है। उपमाओं, विशेषणों की कमी पड़ रही है। सब इस ऐतिहासिक   मौके पर पोस्ट लिखने के लिए बेताब हैं। सचिन राठौड़ अपने ब्लॉग अपना समाज पर जीत को लेकर बेहद भावुक हो उठे हैं। http://apnasamaj.blogspot.com पर उन्होंने किसी शायर का या शायद अपना ही एक शेर दे मारा है। ये हौसले की कमी ही तो थी, जो हमको ले डूबी, वरना भंवर से किनारे का फासला ही क्या था। 

सब मानते हैं कि विश्व कप शत-प्रतिशत 121 करोड़ भारतीयों का सपना था। अगर यह आपका अपना सपना नहीं था, तो ऐसे लेखों के प्रति आप आपत्ति जता सकते हैं या नहीं, तो सबमें शामिल कर लिए जाने पर मुस्कुरा सकते हैं। खैर, सचिन लिखते हैं कि अब सपनों को मरने नहीं देना है। हार से निराश नहीं होना है।

जगदीश्वर चतुर्वेदी ने अपने ब्लॉग नया जमाना पर लिखा है कि लोकतंत्र का महा-उल्लास है क्रिकेट। जीतने के बाद लगा या पहले से था, यह मालूम नहीं, पर खुशी के मौके पर अपने प्रिय ब्लॉगर की चुटकी तो ले ही सकता हूं। प्रो. चतुर्वेदी लिखते हैं कि यह टूर्नामेंट क्रिकेट के साथ महानतम सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक भूमिकाओं के लिए याद किया जाएगा। यह टूर्नामेंट मंदी के दौर में हो रहा है और इसने भारत के उपभोक्ता बाजार को चंगा करने और मीडिया उद्योग को मस्त बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। वह http://jagdishwarchaturvedi.blogspot.com  पर लिख रहे हैं कि क्रिकेट ने लोकतंत्र को ठप्प कर दिया है।

राजनीति के महानायकों को खेल के महानायकों के सामने नतमस्तक होकर बैठे देखना, इस बात का संकेत है कि क्रिकेट लोकतंत्र के राजनीतिक खेल से भी बड़ा है। हमें क्रिकेट को बाजारवाद का औजार मानने की मूर्खताओं से बचना चाहिए। ठीक है कि प्रो. चतुर्वेदी उत्साहित हैं, मगर कपोत्सव के जुनून में तथ्यों पर नियंत्रण न खोते, तो ठीक रहता। आंकड़े किसी मंदी से निकलने की पुष्टि नहीं करते। दूसरा उनकी यह बात ठीक नहीं है कि मीडिया ने भारत-पाक मैच को उन्माद में नहीं बदला। पर होली के जश्न की तरह विश्व कप में जीत के बाद कपोत्सव के जुनून में कही गई बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। मजा लीजिए।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है, naisadak.blogspot.com

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