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बसेरों से बेदखल होते परिंदे

वजीराबाद से नीचे ढलान की ओर यमुना खादर है। यह उस जगह से ज्यादा दूर नहीं, जहां यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है। आप आईटीओ या निजामुद्दीन पुल के पास जैसी यमुना देखते हैं, यहां वह उससे बिल्कुल अलग है। यहां यमुना को देखने के लिए आपको पहले रंग रोड जाना होगा,  विश्वविद्यालय और तीमारपुर से गुजरकर यमुना बायो-डायवर्सिटी पार्क आना होगा,और फिर जगतपुर की धूल-घूसरित राहें पार करनी होंगी। यहां सब्जियों और सरसों के खेतों से गुजरती बालू-पत्थर की सड़कें आपको हरे बेज (टेबल पर बिछाया जाने वाले ऊन का कपड़ा) पर घूसर-भूरी ऊंगलियों के फिराए जाने का एहसास देंगी।

अगर आप सौभाग्यशाली रहे और समय भी माकूल रहा, तो आपका स्वागत लालसर (एक खास तरह का बत्तख) कर सकती हैं। वे जैव विविधिता पार्क में नहीं, बल्कि यहां के खेतों के आस-पास बने तालाबों में दिखेंगी। यूरोप और मध्य एशिया से भारत आने वाली ये बत्तखें काफी आकर्षक होती हैैं। नर लालसर का सिर गुलाबी होता है, जबकि चोंच मनमोहक लाल। मुनिया परिवार की खूबसूरत पक्षी लाल मुनिया, अफ्रीकी और दूसरे एशियाई देशों से आने वाली छोटी-छोटी चिड़ियां, वार्बलर, चिफ-चैफ और कई अन्य दूसरी चुनमुनियां भी यहां अपने डेरे डालती हैं। यहां आपको यूरेशियन मार्श हैरियर्स भी दिख सकती हैं। सर्दी के महीनों में यहां का आसमान काले व भूरे सिर वाले गुल पक्षी और कभी-कभी पलास गुलों से भरा रहता है।

आगे बढ़ने पर सड़कें अचानक खत्म हो जाती हैं और आप खुद को यमुना के बिल्कुल करीब पाते हैं। आम दिनों में यहां कुछ लोगों को नहाते, तो कुछ को अपने दिवंगत परिजनों का अस्थि विसर्जन करते और कुछ को तफरीह करते देखा जा सकता है। कचरे, प्लास्टिक की बोतलें, गेंदा फूल की मालाएं और चिप्स या बिस्कुट के चमकदार पैकेट भी यहां पसरे दिखते हैं। अठखेलियां करती हुईं टिटहरी (इसकी दो किस्में तो आसानी से दिख जाती हैं और अगर आपका दिन अच्छा हुआ, तो इसकी तीसरी किस्म भी आप देख सकेंगे) व भरत पक्षी भी दिख जाएंगे। यहां यमुना का पानी अपेक्षाकृत साफ दिखता है। सर्दी के महीनों में यह जलधारा गुल, तिदारी बत्तख, भांति-भांति के लालसर सहित उन तमाम बत्तखों से अटी रहती है, जो दिल्ली का अपना बसेरा मानते हैं। मैं खुद एक ढलती दोपहरी में यहां सूरज की कुम्हलाती रोशनी के बीच सुर्खाब बत्तखों को गोता लगाते देख चुका हूं। पत्नी और बेटा मेरे साथ थे। उस दिन हमने करीब 60 प्रजाति के सुर्खाब देखे, जो निश्चय ही दिल्ली में काफी ज्यादा नहीं हैं, क्योंकि यहां 30 तरह के सुर्खाब तो आप अपने बगीचे में ही देख सकते हैं। मेरा मानना है कि उस दिन दूसरे लोगों ने और ज्यादा सुर्खाब देखे होंगे।


दरअसल, दिल्ली और यहां का माहौल पक्षी विशेषज्ञों के लिए खुश होने की वजहें भी देता है, तो दुखी होने के  कारण भी। एक बार हम कुछ लोग शहर से 90-100 किलोमीटर दूर डीघल गए थे, ताकि एक दुर्लभ प्रजाति की बत्तख मार्बल्ड टील को देख सकें। वह भारत में अपनी राह भटक गई थी और वहां आ पहुंची थी। गांव के बीचोबीच एक तालाब में हमने उसे तैरते देखा था। इसी तरह, पश्चिम दिल्ली के एक बड़े टीवी टावर पर एक घुमंतू बाज को भी देखा जा सकता है, जो यहां हर साल अपना आशियाना बनाता है।


ज्यादातर लोग पक्षियों को जंगल से जोड़कर देखते हैं और वे इनके लिए हरित क्षेत्र बनाने की वकालत भी जरूर करते हैं। मगर परती व कृषि जमीनें और पार्क के पीछे उगे झाड़-झंखाड़ चिड़ियों के बेहतर बसेरे हैं। दिल्ली के अरावली जैव विविधता पार्क, बसई, सुल्तानपुर, भिंडावास, डीघल जैसे कई नजदीकी इलाके सदियों से यूरोप व मध्य एशिया से आने-जाने वाले पक्षियों के सराय रहे हैं। ऐसे कुछ क्षेत्र तो अब राष्ट्रीय पार्क बन गए, मगर कई अब भी खेती की निजी-सार्वजनिक जमीनें हैं।

कहना गलत नहीं होगा कि देश भर में ऐसी जमीनों पर संकट के घने बादल मंडरा रहे हैं। वे शहरों के अथक विकास की भेंट चढ़ रही हैं। उनके मालिक उन्हें बेच रहे हैं। बसई में ही कंक्रीट के जंगल उन जमीनों पर भी उग आए हैं, जो कभी हजारों सिलेटी कलहंस और बगुलों का आशियाना हुआ करते थे। बेशक हिमालय पार करके ये परिंदे आज भी यहां आते हैं, मगर अब उनकी संख्या घट रही है। उत्तर प्रदेश के दादरी (ग्रेटर नोएडा) में भी शिव नडार यूनिवर्सिटी और अंसल की विकास परियोजनाएं तेजी से चल रही हैं, जबकि यहां बील अकबरपुर के पास का विशाल झील और दलदली इलाका कभी हजारों बगुलों व बत्तखों से गुलजार रहा करता था। यूनिवर्सिटी के पीछे के मैदान में साल 2014 में किसी पक्षी विशेषज्ञ ने एक खरमोर पक्षी को अपने कैमरे में कैद किया था। यह पक्षी दुर्लभ प्रजातियों की सूची में शामिल है और इसे संरक्षण प्राप्त है। मेरा मानना है कि हम इंसानी विकास यात्रा में दूसरे जीवों की तुलना में पक्षियों ने कहीं अधिक लचीलापन दिखाया है।

यहीं पर धनौरी कलां भी है, जो दादरी से बहुत ज्यादा दूर नहीं है। नजदीक के गांव भट्टा में जब किसानों ने अपनी जमीन के बदले में रियल एस्टेट डेवलपरों से उचित मुआवजा न मिलने पर आंदोलन किया, तो यह गांव भी सुर्खियों में आ गया। धनौरी की जमीनें दिल्ली के आस-पास सारस के सबसे बड़े बसेरे में गिनी जाती हैं। मैंने खुद यहां 120-125 सारस को अठखेलियां करते देखा है। मगर धनौरी का नसीब अच्छा था और इसके लिए हमें पर्यावरणविद आनंद आर्य का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिनके प्रयास से यह इलाका दलदली भूमि के रूप में वर्गीकृत हो सका।
दुर्भाग्य से दूसरे इलाके इतने सौभाग्यशाली नहीं रहे।

अपने देश में शायद ही ऐसी जमीनों को कोई ‘पर्यावरण’ महत्व की नजरों से देखता है। वैसे, यह अपने यहां कोई हैरत की बात नहीं है। आखिरकार ज्यादातर लोग यही तो सोचते हैं कि जमीनों से झाड़-झंखाड़ हटाना और उनकी जगह ऑस्ट्रेलियाई घास लगाना पर्यावरण के लिहाज से काफी ‘बढ़िया’ है।
 

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  • Web Title:parinde is evicted from the buses
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