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आरोपी नेताओं का निलंबन आदेश नहीं दिया जा सकता: SC

नई दिल्ली, एजेंसी First Published:04-01-2013 03:09:02 PMLast Updated:04-01-2013 05:39:38 PM
आरोपी नेताओं का निलंबन आदेश नहीं दिया जा सकता: SC

उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए आरोपपत्र में आरोपी सांसदों और विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग संबंधी अनुरोध पर सुनवाई से शुक्रवार को इनकार कर दिया, लेकिन बलात्कार मामलों की त्वरित अदालत में सुनवाई तथा महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानूनों के कार्यान्वयन के मुद्दे पर गौर करने के लिए सहमत हो गया।

राजधानी में 16 दिसंबर की रात चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद दायर दो जनहित याचिकाओं पर न्यायालय सुनवाई कर रहा था। न्यायालय ने कहा कि वह सीमित मुद्दों पर सरकार को केवल नोटिस जारी कर सकता है, क्योंकि याचिकाओं में किए गए कुछ अनुरोध उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की पीठ ने कहा सांसदों और विधायकों की अयोग्यता का मुद्दा हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। याचिकाओं में न्यायालय से अनुरोध किया गया था कि वह उन सांसदों और विधायकों के निलंबन के लिए आदेश दे जो महिलाओं के खिलाफ अपराध के सिलसिले में दायर आरोपपत्रों में आरोपी हैं।

सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को इस बात को भी आधार बनाना चाहिए था कि यदि ऐसे मामलों में समुचित जांच नहीं की जाती है तो इसे जांच अधिकारी की ओर से किया गया कदाचार माना जाए।

न्यायालय ने सरकार से कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध और बलात्कार से संबंधित कानूनों की समीक्षा के लिये गठित न्यायमूर्ति जे एस वर्मा समिति की कार्यशर्तों से उसे अवगत कराये। आपराधिक मामलों में आरोपी राजनीतिज्ञों की अयोग्यता के बारे में तर्क दिए जाने पर न्यायाधीशों ने कहा कि व्यक्ति की हैसियत पर ध्यान दिए बिना मामले की सुनवाई त्वरित अदालत में की जानी चाहिए।

पीठ को बताया गया कि देश में 4835 सांसदों और विधायकों में से 1448 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। बहरहाल, पीठ ने कहा कि फिलहाल उसने सीमित मुद्दों पर जनहित याचिका की सुनवाई करने का फैसला किया है। त्वरित अदालतों और अतिरिक्त न्यायाधीशों की जरूरत पर सहमति जताते हुए पीठ ने कहा न्यायाधीशों के कई पद रिक्त हैं और कई अदालतों की स्थापना की जानी है।

जिन याचिकाओं पर पीठ ने यह व्यवस्था दी वह याचिकाएं सेवानिवृत्त महिला आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर और अधिवक्ता तथा सामाजिक कार्यकर्ता ओमिका दुबे ने दायर की थी।

शंकर ने अपनी याचिका में महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए आरोपपत्र में आरोपित सांसदों और विधायकों के निलंबन की मांग के साथ यह भी कहा था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बलात्कार और अपराध के मामलों की जांच महिला पुलिस अधिकारी से कराने और ऐसे मुकदमों की सुनवाई महिला न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा था कि महिलाओं की सुरक्षा के उददेश्य से वर्तमान कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। दुबे ने महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए तथा बलात्कार पीतिड़ को क्षतिपूर्ति राशि अनिवार्य रूप से दिए जाने का अनुरोध किया था।

उन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को महिलाओं के अश्लील चित्रों का प्रसारण रोकने के लिए आदेश देने की मांग भी की थी। इसके अलावा दुबे ने रेडलाइट इलाकों का मुद्दा भी उठाया, जहां लड़कियों को देह व्यापार करने के लिए बाध्य किया जाता है।

यह जनहित याचिकाएं दिल्ली में गत 16 दिसंबर की रात 23 वर्षीय एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और दरिंदगी की घटना होने के बाद दायर की गई थीं। इस छात्रा की 29 दिसंबर को सिंगापुर के अस्पताल में मौत हो गई थी।

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