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प्राइवेट स्कूलों का रूख कर रहे हैं बच्चे

प्राइवेट स्कूलों का रूख कर रहे हैं बच्चे

सर्व शिक्षा अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद देश के ग्रामीण इलाकों में बच्चे सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़कर प्राइवेट स्कूलों की तरफ जा रहे हैं। 2006-07 तक पिछले पांच साल में सर्वशिक्षा अभियान पर 36 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। इनमें केन्द्र और राज्य की राशि शामिल है। लेकिन इन पांच सालों के भीतर प्राइवेट स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है।

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘असर’  ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। सर्वेक्षण के अनुसार सन 2005 में ग्रामीण इलाकों में 16.4 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे पर 2008 तक आते-आते इनकी संख्या बढ़कर 22.5 प्रतिशत हो गई, यानी करीब छह प्रतिशत से अधिक बच्चे अब प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने लगे हैं।

इनमें सर्वाधिक बढ़ोतरी कर्नाटक में हुई है। कर्नाटक में 2005 में 9.50 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे पर 2008 तक आते-आते इनकी संख्या दोगुनी हो गई यानी 18.10 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने लगे। सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2005 में राजस्थान में 21.9 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे पर 2008 तक आते-आते उनकी संख्या बढ़कर 32.70 प्रतिशत हो गई।


इसी तरह 2005 में उत्तर प्रदेश में 28 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे जो 2008 में बढ़कर 35.9 प्रतिशत हो गए। रिपोर्ट के अनुसार सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़कर प्राइवेट स्कूलों की तरफ जाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि अब लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। दूसरा कारण यह है कि लोगों का यह नजरिया है कि प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूलों से बेहतर हैं। तीसरा कारण यह भी है कि ग्रामीण इलाकों में प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढ़ रही है।

रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का यह हाल है कि निजी स्कूलों के पहली कक्षा के केवल 78 प्रतिशत बच्चों को अक्षर ज्ञान है, जबकि सरकारी स्कूलों में केवल 60 प्रतिशत बच्चे अक्षर ज्ञान कर पाते हैं। इसी तरह निजी स्कूलों में तीसरी कक्षा में होने के बावजूद केवल 64 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा की किताबें पढ़ लेते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में तीसरी कक्षा के मात्र 47 प्रतिशत बच्चे ही पहली कक्षा की किताबें पढ़ पाते हैं।

इसी तरह निजी स्कूलों में पांचवीं कक्षा के केवल 66 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की पुस्तकें पढ़ पाते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में पांचवी कक्षा के केवल 53.1 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की किताबें पढ़ पाते हैं।

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