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आग है कि ठंडी पड़ती ही नहीं

जयंती रंगनाथन, सीनियर फीचर एडीटर First Published:08-01-2013 06:58:38 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

पिछले तीन हफ्तों से सोचने-समझने की रफ्तार थम-सी गई है। दिल के अंदर ऐसा घाव बन गया है, जो लगातार बढ़ रहा है। ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं है, हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण की मानें, तो इस समय देश की लगभग 61 प्रतिशत औरतें इस आग में खौल रही हैं। ऐसा नहीं है कि 16 दिसंबर से पहले देश में या राजधानी में कोई स्त्री बलात्कार का शिकार नहीं हुई। जिस देश में हर चार घंटे में नवजात से लेकर वृद्धा तक कोई एक बलात्कार की शिकार बन जाती है, वहां इस तरह की घटना पर पूरे देश में इतना रोष शायद पहली बार देखने को मिला है। पर अब इस घटना को एक स्त्री के साथ बलात्कार मात्र के रूप देखने का वक्त बीत गया। यह वक्त है, जब हमारे चारों तरफ खतरे की घंटी बज रही है, समाज में नैतिकता का सुनामी उफान के साथ फन उठाए लीलने को आतुर है औरअंतस तक भर आया आक्रोश है कि जाता ही नहीं। अब समाज के नौजवानों और स्त्रियों की लड़ाई सिर्फ बलात्कारियों को फांसी की सजा दिलवाने तक सीमित नहीं रह गई है। इन बलात्कारियों को चाहे जितनी जघन्य सजा मिल जाए, क्या इससे यह बात पुख्ता हो जाएगी कि भविष्य में देश में इस तरह की कोई घटना नहीं होगी?

फिर कोई दो साल की कन्या, 23 साल की युवती या 65 साल की वृद्धा किसी के हवस और संहार का शिकार नहीं बनेगी? इस बात पर बहस भी होती हैं और तर्क भी दिए जाते हैं। इस घटना के बाद दो तरह के व्यक्ति सामने आए हैं, एक वे, जो झंडा उठाकर अपराधियों को जघन्य सजा देने की मांग पर दिन-रात एक किए हुए हैं, सड़कों पर निकल पड़े हैं। न हाड़ कंपाती ठंड के थपेड़ों ने उनका हौसला कम किया है और न पुलिस के लाठी-डंडों ने। दूसरे वे हैं, जो इस मौके पर जो मुंह में आया, बोल रहे हैं और बलात्कार कांड की आंच पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं। इनके लिए स्त्री वह गाय है, जिसे वे अपने हुक्मउदूली पर सबक भी सिखाना चाहते हैं और दुहना भी। कुछ ही दिन बीते थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत ने कहा था कि इंडिया में ऐसी वारदात होती हैं, भारत में नहीं होतीं। वह आश्वस्त हैं कि बलात्कार जैसी घटनाएं पश्चिमी सभ्यता की देन हैं। दो दिन पहले आध्यामिक गुरु आसाराम बापू ने इस घटना को दूसरा ही रंग दे दिया। उनके वचन थे- अगर पीड़िता ने अपराधियों को भाई बना लिया होता, अपनी अस्मिता के लिए गिड़गिड़ाती, तो इतना दुराचार न होता। ताली एक हाथ से नहीं बजती।

इन बयानों से उठे बवालों के बीच एक मित्र की 11 साल की बेटी ने मासूम-सा सवाल उठाया- क्या ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है? क्या मैं अकेली कहीं नहीं जा सकती? उस बच्ची के अंदर लगातार डर बैठता जा रहा है। हमारी बेटियों को हमने डरना तो नहीं सिखाया था। हमारे सामने जब छोटे-छोटे पग भरती हमारी बेटियां कैरियर और जीवन पथ पर आगे बढ़ती हैं, हम बड़े गौरव के साथ उन्हें अकेले पढ़ने, नौकरी करने दूसरे शहरों में भेजते हैं। बेटियों का पढ़ना या नौकरी करना पश्चिमी समाज की देन मानने वाला वर्ग कई साल से इस कोशिश में है कि पुरुष सत्ता की जो कमान सदियों से उनके हाथ में है और जिसकी धार भौंथरी होती जा रही है, उसे किस तरह तेज बनाए रखे। उस वर्ग ने समय-समय पर कई तुगलकी फरमान जारी किए हैं—स्त्रियों की पोशाक पर, उनके आचरण पर, नौकरी करने पर, उच्च शिक्षा पर, मोबाइल फोन पर। इन हमलों से बेटियों का आगे बढ़ना रुका नहीं।

लेकिन स्त्रियों का मनोबल तोड़ने की साजिश करने वाले अपनी करतूतों से बाज नहीं आते। मुझे कुछ साल पहले की एक घटना तरतीबवार याद है। अपनी पढ़ी-लिखी और नौकरी पेशा सहेली के घर चाय पर गई थी। हमारी गपबाजी शुरू हुई ही थी कि सहेली के ससुर ने दूसरे कमरे से उसे गाली देते हुए आवाज लगाई कि चाय ठंडी क्यों है? सहेली ने हमें जैसे सफाई देते हुए कहा कि गांव से आए हैं और वहां औरतों को ऐसे ही पुकारा जाता है। उन्होंने अपनी सास के साथ भी ऐसा होते हुए देखा था और उनके अपने परिवार के पुरुष सदस्य इस बात पर रोक नहीं लगा पा रहे थे। हम जिस समाज और संस्कारों की दुहाई दे कर बेटियों को जीन्स पहनने से रोकना चाहते हैं, अकेले बाहर जाने पर बंदिशें लगाते हैं, क्या उस समाज और संस्कारों में बेटे को स्त्रियों के प्रति संवेदनशील होने का पाठ पढ़ाना जरूरी नहीं? दरअसल स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की नींव तो घर और परिवार में ही बन जाती है।

एक स्त्री ही अपनी बेटी और बेटे के बीच भेदभाव कर अपनी खुद की बेटी के लिए कुआं खोदने का काम करती है। क्या बेटियों के साथ-साथ बेटों को सही संस्कार देना परिवार और समाज की जिम्मेदारी नहीं है? आज की तारीख में ऐसे समाज की कल्पना करना बहुत मुश्किल है, जहां स्त्रियां हर तरह से सुरक्षित हों। गांव से ले कर शहरों तक और संयुक्त परिवारों से ले कर एकल परिवारों तक। गांवों में औरतों पर जिस किस्म के जुल्म ढाए जाते हैं, वह अकल्पनीय है। औरतों पर हिंसा पढ़े-लिखे समाज में भी कम नहीं होती है। घरों के अंदर भी बेटियां महफूज नहीं। पश्चिमी समाज और लड़कियों के आधुनिक कपड़ों पर आपत्ति जताने वाले इस मुद्दे पर अधिकांशत: चुप्पी साध लेते हैं।

हमारी पीढ़ी ने अपने आस-पास की स्त्रियों और खास कर अपनी बेटियों को स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की पट्टी पढ़ाई। उनकी लड़ाई बेहद लंबी है। अपने आपको एक जमीन पर स्थापित करने के अलावा उन्हें समाज को हर मौके पर अपने आजाद होने की सफाई भी देनी पड़ती है। आज औरतों की लड़ाई सिर्फ एक बलात्कार के अपराधी को सजा दिलवाने भर की नहीं होनी चाहिए, पूरे सिस्टम की सफाई के लिए होनी चाहिए। जो लोग इस समय पीड़िता पर, स्त्रियों पर अभद्र टिप्पणी कर रहे हैं, बेलगाम बोल रहे हैं, उनका अपराध भी कम नहीं है। शायद यही वजह है कि दिल में जो आग लगी है, वह कम होती ही नहीं है।

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