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कैंडिल मार्च करा लो.., स्पेशल डिस्काउंट ऑफर

सुरेश नीरव First Published:07-01-2013 07:27:55 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

भारत अब मोमबत्ती प्रधान देश बन चुका है। यह मोमबत्ती मस्त देश भी है और मोमबत्ती-ग्रस्त और मोमबत्ती-त्रस्त भी। मोमबत्तियां हमारे देश के लोकतंत्र का राष्ट्रीय-श्रृंगार हैं। पब्लिक जब कभी सरकार पर गुस्साती है, तो लाल-पीली मोमबत्तियां लेकर तड़ से सड़क पर उतर आती है। वह सरकार को आंख कम, मोमबत्तियां ज्यादा दिखाती है। प्रशासन इन मोमबत्तियों को देख ऐसे उखड़ता है, जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड़। बौराया प्रशासन लाठी की मार से, पानी की धार से, प्लास्टिक की गोलियों और आंसूगैस के गोलों से और इसी नस्ल के नानाविध कारनामों से इन मोमबत्तियों को डराता है और फिर ऑन डय़ूटी जान बचाकर हांफता-कांपता किसी जांच आयोग की गोद में जाकर दुबक जाता है। अपनी ऑलराउंड उपयोगिता के कारण आज देश में इन मोमबत्तियों का कारोबार पक्ष-विपक्ष की अखंड सर्वसम्मति से खूब फल-फूल रहा है। रंगीन सस्ती झालरों और लड़ियों से लैस होकर इस उद्योग की वाट लगाने की दीवाली पर चीन ने जो फिर कुटिल चाल चली थी वह औंधे मुंह धड़ाम हो गई। संवेदनशील सियासत ने बिना शर्त इसे डूबने से बचा लिया। कालीन,खिलौने और इलेक्ट्रनिक्स के उजड़े व्यापारी आज इस मोमबत्ती उद्योग के आढ़तिये बन गये हैं।

जलूस हो या शादी, जींस हो या खादी, ग्रीटिंगकार्ड हो या ग्रेवयार्ड, बर्थडे केक या लाइफ पर लगा ब्रेक सबकी सदाबहार रौनक इन मोमबत्तियों से ही तो है। आज हर भारतीय स्वेच्छा से मोमबत्ती धर्मा हो चुका है। वह कैंडिल लाइट डिनर में खाता है, कैंडिल लाइट की रेशमी रोशनी में नाचता है, गाता है। फिर पूरे उल्लास के साथ किसी कैंडिल मार्च में शामिल हो जाता है। यह मार्च मोमबत्ती आढ़तियों की सूझ-बूझ व सरकार की समर्पण भावना से आज भारत का अघोषित दैनिक सार्वजनिक व्यायाम बनता जा रहा है। परदेशी मदाम तुसाद के म्यूजियम में तो सिर्फ मोम के पुतले ही बनाकर लगाए जाते हैं अपुन का तो पूरा कंट्री ही आज मोमबत्तीमय हो गया है। इसलिए तो आजकल भ्रष्टाचार और मोमबत्ती कारोबार में बराबरी का उछाल आया हुआ है। और इनके लुढ़कने का फिलहाल कोई चांस भी नहीं है।

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