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कितना बदल गया है माओ का चीन

आशुतोष, मैनेजिंग एडीटर, आईबीएन-7 First Published:06-01-2013 08:05:58 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

बीजिंग एयरपोर्ट पर उतरते ही बताया गया कि बाहर का तापमान माइनस नौ डिग्री है। हम दिल्लीवासियों को ठंड का अंदाजा तो है, लेकिन इतनी ठंडक सुनकर सिहर गया। खैर, जैसे-तैसे होटल आया। कपड़े बदले। कुछ खाने के लिए बाहर निकला। होटल के पास ही मर्सिडीज का शो रूम था। उसकी बगल में रॉल्स रायस का शो रूम। पड़ोस में फरारी और फिर एस्टन मार्टिन, बीएमडब्ल्यू, न जाने कितनी निहायत महंगी गाड़ियों के शो रूम। सारे के सारे आधे किलोमीटर के दायरे में। पूरे शहर में इस तरह के कई शो रूम मिले। थोड़ी दूर चला, तो फिर चौंका। गुच्ची, शनेल, जारा, गैप जैसे पश्चिमी कपड़ों के विश्व प्रसिद्ध ब्रांडों के बड़े-बड़े स्टोर्स। गाड़ियों की ही तरह इन ब्राडों के एक दो नहीं, दर्जनों स्टोर मिले। थोड़ी दूर और चला, तो नई उम्र के लड़के-लड़कियों के हाथों में आईफोन या फिर इसी तरह के दूसरे महंगे फोन दिखे। रेस्तरां और मेट्रो में शायद ही कोई हाथ हो, जिसमें इस तरह के महंगे फोन न हों। सब के सब इन फोनों, आईपैडों या फिर टैबलेट्स में आंखें गड़ाए अपनी ही दुनिया में मशगूल थे। ऐसा लगा, मानो बीजिंग फोन-हिप्नोटाइज्ड हो गया हो।

बीजिंग से शंघाई आया। वहां भी कपड़ों के बड़े-बड़े ब्रांडों के और भी बड़े स्टोर्स मिले। खासकर ईस्ट नानजिंग रोड और वेस्ट नानजिंग रोड पर, दोनों तरफ। एक जगह पर लुई वितां का एक स्टोर शाम के वक्त दिखा। पूरी इमारत लुई वितां के नाम। हर दो मिनट में पूरी इमारत का रंग बदल जाता था। कभी लाल, तो कभी नीला और कभी हल्का आसमानी। बड़ी देर तक मैं इस नजारे को देखता रहा। वेस्ट नानजिंग रोड से बुंड तक पैदल चलते हुए एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि मैं चीन के किसी शहर में हूं। यूरोप और अमेरिका की तर्ज पर बनी इमारतें। उतनी ही बड़ी और उतनी ही आलीशान। रात की रोशनी में उसी तरह चमचमाती हुई। अंदर इन स्टोर्स को संभालते युवा चीनी चेहरे और हर चीज को खरीद लेने की होड़ दिखी। चीन के बारे में सुना था कि वहां का खाना जरा संभलकर आजमाना चाहिए। लेकिन ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। हर दो सौ मीटर पर कोई न कोई पश्चिमी खान-पान का बड़ा रेस्तरां दिख जाएगा।

मैकडोनाल्ड और केएफसी की भरमार है। पिज्जा हट भी है और सबवे की ताजा सैंडविच भी। स्टार बक की कॉफी भी है। शंघाई ने तो बाकायदा फ्रेंच-कंसेशन को भी सहेजकर रखा है। यह वही इलाका है, जहां कभी फ्रांसीसी अठारहवीं शताब्दी में रहा करते थे। मजे की बात यह है कि इस इलाके में ही 1921 में कम्युनिस्ट पार्टी की पहली बैठक हुई थी। इस इमारत के आसपास घूमते हुए सोचता रहा कि क्या माओ त्से तुंग ने इसी चीन के लिए 1949 में मार्क्सवादी क्रांति की थी? और अगर आज माओ जिंदा होते, तो क्या तब भी चीन में यही सब देखने को मिलता। शायद ऐसा नहीं होता। माओ के जमाने में चीन ने हमेशा पश्चिम और उसकी पूंजीवादी विचारधारा का विरोध किया। उसको उखाड़ फेंकने की जुगत भिड़ाता रहा।

चीन के पुराने लोगों का कहना है कि शंघाई और बीजिंग आज से बीस साल पहले ऐसे नहीं थे। न इतनी ऊंची इमारतें थीं और न ही पश्चिमी सभ्यता के इतने लब्ध प्रतिष्ठित निशान। चीन माओ के जमाने में मूलत: एक कृषि प्रधान देश था। जो साम्यवादी तरीके से विकास करने की कोशिश कर रहा था। माओ के समय में बाजार व्यवस्था नहीं थी। निजीकरण की इजाजत नहीं थी। लेकिन तब चीन में समृद्धि भी नहीं थी। इसका काफी बड़ा हिस्सा कभी भुखमरी और कभी अकाल का शिकार होता था। पचास और साठ के दशक में माओ की सनक और प्रयोगवाद के चलते करोड़ों लोग मारे गए। उनके साथी देंग जियाओ पेंग ने चीन को माओ की मौत के बाद नई दिशा दी। पूंजीवादी व्यवस्था अपनाई। चीन ने दशकों के बाद सामाजिक स्थिरता देखी और सड़कों और कस्बों में लोगों ने समृद्धि का स्वाद चखा। लोग आज भी कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकारवादी शासन में रह रहे हैं, लेकिन आज लोगों के चेहरे पर दहशत नहीं दिखती। लोग खुश हैं।

वे आर्थिक आजादी को इंज्वॉय कर रहे हैं। उनके लिए आईफोन बात करने का औजार नहीं, उनकी आर्थिक स्वतंत्रता का जीता-जागता प्रमाण है। हालांकि, आज भी चीन में राजनीतिक मामलों पर बोलने की आजादी नहीं है। लेकिन शायद लोगों को अभी उसकी जरूरत भी नहीं है। वे नई खुशहाली का पूरा मजा ले लेना चाहते हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी समाज से एक अघोषित समझौता कर रखा है। तुम हमें शासन करने दो और हम तु्म्हें खुशहाल करते जाएंगे। उसने लोगों को यह सपना दिखा रखा है कि वे दिन दूर नहीं, जब यह देश अमेरिका को पीछे छोड़ देगा और दुनिया का सबसे विकसित, सबसे ताकतवर मुल्क बन जाएगा, जैसे वह मिंग राजाओं के जमाने में था। तब चीन को मिडिल-किंगडम कहा जाता था, यानी विश्व का केंद्र।

यह सपना सुनहरा है, लेकिन चीन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं। तमाम अर्थशास्त्री यह कहते थकते नहीं कि जल्द ही चीन अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। लेकिन नानजिंग की सड़कों पर घूमते हुए मुङो यह बात थोड़ी अटपटी लगी, क्योंकि वहां जिधर नजर जाती, मुझे मैक्डोनाल्ड का बर्गर दिखाई पड़ता था। अमेरिका किसी अर्थव्यवस्था का नाम नहीं है, वह एक सभ्यता का नाम है। चीन ने पिछले दिनों निश्चित रूप से हार्ड-पावर में अमेरिका से बराबरी करने की कोशिश की है, लेकिन अमेरिका की ताकत आज उसकी सॉफ्ट-पावर है। सॉफ्ट-पावर यानी जोसेफ नाई के शब्दों में अमेरिका की वह मूल्य-व्यवस्था, जिसकी नक्ल करने के लिए आज पूरी दुनिया उतावली है।

बिना किसी अमेरिकी जोर-जबर्दस्ती के। शंघाई और बीजिंग के रेस्तरां में मैक्डोनाल्ड के मैक-बर्गर और मैक-कॉफी का मजा लेते लोग, मेट्रो में आईफोन में अपनी नई दुनिया खोजते लोग और यूनिवर्सिटी और सड़कों पर ली-वाइज की जींस में मटरगस्ती करते लोग, दरअसल जाने-अनजाने अमेरिकी सभ्यता को ही अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर रहे हैं। या फिर नियाल फगरुसन की भाषा में कहें, तो यह उस विचारधारा की अजीब विडंबना है कि जिस विचारधारा ने पूरी दुनिया को अनंत चुनाव का मौका दिया, वह पूरी मानवता को एक जैसा करने और दिखने में कामयाब रही। तो क्या कहें कि चीन ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया का हिस्सा हो गया या फिर अमेरिकी सॉफ्ट-पावर का शिकार?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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