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हिंदी का पुष्पगुच्छ हर्गिज न बनना

सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार First Published:05-01-2013 10:24:03 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

हिंदी नई चीज को तुरंत अपनाती है। इन दिनों हिंदी ने ‘पुष्पगुच्छ’ अपना लिया है। नतीजा यह है कि हर जगह हिंदी पुष्पगुच्छमय नजर आती है। कभी ‘गुलदस्ता’ होता था। अब सर्वत्र ‘पुष्पगुच्छ’ होता है। ‘पुष्प’ बोलते ही गायब हो जाता है, ‘गुच्छ’ रह जाता है। ‘गुच्छ’ से चाबियों के ‘गुच्छ’ की ‘तुच्छ’ धुन सुनाई पड़ती है! अंग्रेजी वाले ‘बूके-बूके’ करते रहते हैं, तो हिंदी वाले पुष्पगुच्छ क्यों न किया करें? जो अंग्रेजी करती है, वही हिंदी हिंदी में करती है। अंग्रेजी से होड़ ठहरी। हिंदी चाहती, तो ‘गुलदस्ता’ कह सकती थी, लेकिन हिंदी के पंडित उर्दू से उधार क्यों लें? वे किस बात में हेठे हैं जी?

हिंदी में शुद्धीकरण अब भी जारी है। शुद्ध की तलाश न होती, तो ‘सर’ को ‘श्रीमान’ क्यों कहा जाता? ‘रेस्पेक्टेड’ को ‘आदरणीय’ क्यों कहा जाता? हमारी हिंदी अंग्रेजी के बराबर है। जो अंग्रेजी में हुआ है, वह हिंदी में हो चुका है। जो हो रहा है, वह हिंदी में भी हो जाना है। उर्दू के ‘गुलदस्ते’ को छोड़ ‘बूके’ से पुष्पगुच्छ निकाला है जनाब! 

हिंदी के पंडित हिंदी में मिलावट को पाप मानते हैं। आम आदमी हिंदी को तोड़ता-मरोड़ता है। मीडिया तो हद ही करता है। ऐसी बिगड़ी हिंदी को बचाने के लिए उसे संस्कृत के खूंटे से बांधना लाजिमी है। कहा भी है: कठिन न हो तो हिंदी क्या? हिंदी वाला क्या? हिंदी में पुष्पगुच्छ या तो ‘प्रदान’ किए जाते हैं या फिर ‘भेंट’ किए जाते हैं। पुष्पगुच्छ बनाने वाले हिंदी की सेवा करने में किसी से पीछे नहीं हैं। वे पुष्प में ‘चमक अलंकार’ लगाकर पुष्पगुच्छ में चार चांद लगाते हैं। वे पुष्पों को पहले छीलते हैं, फिर प्लास्टिक टेप से कसकर बांधते हैं, ऊपर से चमकियों और चमकीले पदार्थो से पुष्पगुच्छ का सोलह श्रृंगार करते हैं। ऐसा लगता है कि पुष्पगुच्छ ने ‘मस्कारा’ लगाया हो। कई बार चमकीली बुंदियों का मस्कारा, जिसे पुष्पगुच्छ प्रदान किया जाता है, उसके गाल। माथे तक लगकर उनकी शोभा बढ़ाता रहता है।

पुष्पगुच्छ प्रदान करने की प्रक्रिया बड़ी ही श्रमसाध्य है। इसी से गोष्ठी सफल या विफल होती है। कुशल संयोजक इस बात का खयाल रखते हैं कि अधिकतम लोगों से अधिकतम लोगों को पुष्पगुच्छ दिलवाए जाएं, ताकि सब खुश रहें। यही साहित्य की साधना कहलाती है।

हर गोष्ठी ज्यौनार की तरह होती है। अच्छा परोसने वाला और अच्छा संयोजक भाग्य से मिलता है। पुष्पगुच्छ भेंट से पहले के परिचय में जरा भी चूक हुई नहीं कि गोष्ठी बिगड़ी। किसे कौन-सा पुष्पगुच्छ भेंट करना है, इसका कठिन निर्णय लेना होता है। अगर पुष्पगुच्छ कार्यक्रम ठीक से निपट गया, तो आयोजक ऐसे खुश होते हैं, जैसे भावरें निर्विघ्न निपट गई हों!

इसके बाद पुष्पगुच्छ को उसकी औकात बताई जाती है: लेखक उसे मेज पर रखता है। मेज पर रखा वह मुआ कैमरे व लेखक के बीच व्यवधान बनता है, इसलिए कुरसियों के पीछे रख दिया जाता है। चौकन्ने कार्यकर्ता उसे उठा लेते हैं और जब ‘गणमान्य’ चलने को होते हैं, तो संयोजक कहता है कि अबे रमेश! सर का पुष्पगुच्छ उनकी कार में डाल दे। पुष्पगुच्छ कार में पसीजते रहते हैं। ‘गणमान्य’ उन्हें ड्राइवर को देकर पिंड छुड़ाना चाहते हैं। लेकिन ड्राइवर कहता है : सर, इनका मैं क्या करूंगा? इसीलिए कहता हूं: कुच्छ बनना न बनना, मगर हिंदी का पुष्पगुच्छ हर्गिज न बनना!

 

 
 
 
 
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