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नींद का मामला है

राजीव कटारा First Published:04-01-2013 07:33:51 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

मीटिंग में कोई ऊंघ-सा रहा था। उन्होंने पूछा, ‘क्या बात है?’ उसने कहा, ‘रात को ठीक से सो नहीं सका।’ खट से वह बोले, ‘मैं तो दो रात का जगा हूं और देखो कितना फ्रेश नजर आता हूं।’  ‘कभी-कभी रात भर जागना तो चल जाता है, लेकिन उसे आदत नहीं बना लेना चाहिए। नींद के मामले में अपने शरीर की बात सुननी चाहिए।’ यह मानना है डॉ. माइकेल जे. ब्रायस का। वह अमेरिकन बोर्ड ऑफ स्लीप मेडिसिन से जुड़े हैं। उनकी किताब ब्यूटी स्लीप  की खासी चर्चा होती है। नींद हमारे लिए बेहद जरूरी है। इस पर शायद ही कोई बहस करता हो। लेकिन कितनी नींद लेनी चाहिए, उसे लेकर काफी कहा-सुना जाता है। कुछ लोग नींद के मामले में जोर-जबर्दस्ती की बात करते हैं। मसलन, कभी किसी भी वक्त जग सकते हैं। बहुत कम सोने से भी काम चल जाता है। कुछ लोग जरूर नींद की एक तय समय-सीमा की बात करते हैं।

हमारे शरीर की एक प्रकृति होती है। हमें सबसे पहले उसे जानने की कोशिश करनी चाहिए। हमें अपने कामकाज के लिहाज से भी तय करना चाहिए कि कब नींद लेनी है? कब जगना है? कब सोना है? असल में हमें अपनी नींद के साथ किसी तरह का पंगा नहीं लेना चाहिए। हाल की तमाम रिसर्च उसके जोखिम पर आगाह करती रही हैं। हम अपनी नींद कब और कैसे लें? इस पर तो काम हो सकता है।

लेकिन नींद तो चाहिए। उसका कोई विकल्प नहीं है। हम रात में काम करें या दिन में। लेकिन अपनी नींद का वक्त तो तय करना पड़ेगा। अब तो रिसर्च यह भी नहीं मानतीं कि क्वालिटी, लेकिन कम समय की नींद कारगर होती है। वह भरपूर नींद की वकालत करती है। अगर वह नहीं मिलेगी, तो हमारे काम पर असर पड़ेगा। आखिर हम काम के लिए ही तो नींद को उड़ाना चाहते हैं न। लेकिन..

 
 
 
 
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