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फिल्म रिव्यू: टेबल न. 21

First Published:04-01-2013 07:29:04 PMLast Updated:05-01-2013 03:09:37 PM
फिल्म रिव्यू: टेबल न. 21

जिंदगी एक जुआ है.. जान की बाजी लगाने वाला होता है जांबाज.. खेलें खेल जी जान से.. जो जाती वही सिकंदर.. रियेलिटी शोज के इस दौर में जब भी कोई गेम शो लांच होता है तो कुछ इसी तरह के जुमले सुनाई पड़ते हैं। फिल्म टेबल नं. 21 के प्रोमोज भी इस फिल्म के प्रति कुछ ऐसी ही उत्सुकता पैदा करते हैं। प्रोमो से जाहिर होता है कि फिल्म का ताना-बाना एक गेम शो के इर्द गिर्द बुना गया होगा। बुना भी गया है, लेकिन यह फिल्म सिर्फ एक गेम शो नहीं है। इस फिल्म में बेशक एक गेम शो खेला जाता है, लेकिन उसकी तह में छिपा है बदला, एक आक्रोश, घुटन और सिर भन्ना देने वाली ऐसी बातें, जिनसे युवा पीढ़ी न जाने कब से जूझ रही है।

फिल्म की कहानी फिजी के एक खूबसूरत द्वीप से शुरू होती है, जहां विवान (राजीव खंडेलवाल) और सिया (टीना देसाई) एक क्विज में जीते हॉलीडे ट्रिप का मजा लेने आये हैं। दोनों ने लव मैरिज की है और शादी को दस साल हो गये हैं। विवान के काम धंधा नहीं है और सिया नौकरी करती है और घर का खर्च चलाती है। बावजूद इसके विवान उसके लिए फिजी में एक महंगा नेकलेस खरीद लेता है। क्योंकि वह उससे बेहद प्यार करता है।

यहां विवान और सिया को एक दावत का न्यौता मिलता है। पता चलता है कि उनका मेजबान अब्दुल रज्जाक खान (परेश रावल) है, जो उन्हें बातों ही बातों में एक गेम खेलने की ऑफर देता है। हर सवाल और उससे जुड़े टास्क को ठीक ढंग से करने पर एक करोड़ रूपये का ईनाम। कुल ईनामी राशि 21 करोड़ रुपये है। विवान-सिया सलाह कर ये गेम खेलने लगते हैं। 2-4 करोड़ रुपये तो वे यूं ही जीत जाते हैं। शाकाहारी होने के बावजूद इसके लिए सिया को मेंढक तक खाने पड़ते हैं। वो खा भी लेती है। लेकिन जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ने लगता है तो रज्जाक आक्रामक और क्रूर होने लगता है। गेम के दौरान एक मौका ऐसा भी आता है, जब विवान-सिया गेम छोड़कर भागना चाहते हैं, लेकिन नियमों के अनुसार वे ऐसा नहीं कर सकते। सिया को विवान को झापड़ मारने पड़ते हैं और विवान को उसका सिर मूंढना पड़ जाता है। एक मौके पर सिया को बचाने के लिए उसे अपना आधा लीटर खून तक इकट्ठा करना पड़ता है। विवान को अनजाने लोगों संग मारपीट तक करनी पड़ती है और सिया की इज्जत तक पर बन आती है।

जल्द ही सिया-विवान को अहसास होता है कि ये एक गेम शो नहीं है। क्योंकि रज्जाक उनसे ऐसे कार्य करवा रहा है, जो उनकी पिछली जिंदगी से वास्ता रखते हैं। उसे इन दोनों की जिंदगी से जुड़ी कई बातों के बारे में काफी विस्तार से पता होता है। वह विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से विवान-सिया के बीच दूरी पैदा कर देता है, जहां वे एक दूसरे की शक्ल तक देखना नहीं चाहते। दरअसल, इस फिल्म का इससे ज्यादा ब्यौरा देना ठीक नहीं है। ये कोई कातिल तलाशने वाली फिल्म नहीं है। लेकिन इसमें जो टास्क विवान-सिया से करवाए गये हैं और किस तरह से वे कार्य धीरे-धीरे घुटन बढ़ाने का काम करते हैं, वे तारीफ के काबिल है। निर्देशक आदित्य दत्त ने फिल्म को रोचक बनाए रखने के लिए इसकी अवधि दो घंटे से थोड़ी ही कम रखी है। ऐसी फिल्म के लिए यह एक स्मार्ट टाइम की तरह है। ऐसे में उन्होंने फिल्म को चुस्त अंदाज में काफी तेजी से आगे बढ़ाया है।

गीतों का स्कोप कम है, फिर भी फिल्म में दो गीत है, जो बुरे नहीं लगते। फिल्म की कहानी के बारे में कयास लगाना बेमानी होगा। क्योंकि क्लाईमैक्स में आकर तस्वीर कयासों से कोसों दूर नजर आती है। फिल्म में राजीव खंडेलवाल और टीना देसाई ने अच्छा काम किया है, लेकिन केन्द्र में रहे हैं परेश रावल। ओह माई गॉड की सफलता के बाद परेश को एक ऐसे रोल में देखना एक अलग अहसास देता है। उनका गेटअप जंचता है। चुटीली से उनकी मुस्कान कब क्रूर हो जाती है पता ही नहीं चलता। वो जब स्क्रीन पर होते हैं तो निगाह कहीं और नहीं जाती। हालांकि उनके हिस्से में कुछ अच्छे संवादों की कमी भी खलती है। यह फिल्म देश के युवाओं की एक ऐसी परेशानी पर फोकस करती है, जिसके बारे में अनुच्छेद 21 में विस्तार से कहा गया है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कॉलेजों एवं विभिन्न शिक्षण संस्थानों में होने वाली रैगिंग की घटनाओं को कैसे एक कहानी से जोड़ा गया है, ये देखने वाली चीज है। फिल्म में संदेश तो है ही। साथ ही ये भी दिखाया गया है कि कैसे इन घटनाओं से किसी की जिंदगी तक बर्बाद हो सकती है। वैसे, इस फिल्म का ट्रीटमेंट काफी हद तक संजय गुप्ता की फिल्म जिंदा से मेल खाता है। बदला उसमें भी था और इसमें भी है। अगर गेम वाली बात निकाल दें तो फिल्म में अंग्रेजी फिल्म सॉ की भी झलक मिलती है। गेम फैक्टर से प्रेरित फिल्म लक के अंश भी फिल्म में मिलते हैं। क्योंकि इस फिल्म में गेम के हिट होने का दारोमदार ऑनलाइन दर्शकों पर दिखाया गया है। थोड़ा और पीछे जाएं तो अंग्रेजी फिल्म दि कंडेम्ड और डेथ रेस जैसी फिल्में भी दिखाई देती हैं, जो गेम शो को ध्यान में रखकर बनाई गयी हैं। लेकिन टेबल नं. 21 में इन तमाम बातों की समानता होने के बावजूद एक नयापन है। अलग सिक्म की फिल्म है।   
कलाकार: राजीव खंडेलवाल, टीना देसाई, परेश रावल, ध्रुव गणेश, हनीफ हिलाल, आशीष कपूर
निर्देशक: आदित्य दत्त
निर्माता: विक्की राजानी और सुनील लुल्ला
बैनर: ईरोज इंटरनेशनल
संगीत: गजेन्द्र वर्मा, सचिन गुप्ता
लेखक: श्रीशंख आनंद और शांतनु राय छिब्बर
संवाद: अभिजीत देशपांडे
पटकथा: श्रीशंख आनंद, अभिजीत देशपांडे

लोगों ने कहा
अच्छी फिल्म है, शुरू से लेकर अंत तक रोमांच बना रहता है।
पूनम, टीचर
लोकेशन अच्छी है। टीना देसाई मस्त लगी हैं। रैगिंग पर बनी मस्त मूवी है।
अंकित, आर्टिस्ट
परेश रावल का अभिनय काबिले तारीफ है। कहानी अच्छी है। म्यूजिक भी ठीक-ठाक है।
सिल्की बनर्जी

 

 
 
 
 
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