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बदबूदार गीतों के गायक

राजेन्द्र धोड़पकर First Published:02-01-2013 09:45:56 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

बदलते दौर के साथ कुछ चीजें अजीब हो गई हैं। पहले यह माना जाता था कि बाथरूम में गाने का हक सबको है, लेकिन रिकॉर्डिग स्टूडियो में गाने का हक उसी को है, जिसे गाना आता हो। अब जो फिल्मी गाने हैं, उन्हें सुनकर यह लगता है कि जैसे लड़कों के होस्टल के बाथरूम में इन्हें रिकॉर्ड कर लिया है। वैसे ही एक जमाने में सार्वजनिक शौचालयों में कुछ लोग अपने विचार प्रकट करते थे, जिनकी बदबू सार्वजनिक शौचालयों की आम बदबू से कम नहीं थी। अब मेरा खयाल है कि वे सारे लोग हिंदी फिल्मों में गाने लिखने लगे हैं और बचे हुए लोग टीवी के विभिन्न कॉमेडी कार्यक्रमों में आने लगे हैं। पहले शादी में बैंड बजाने वाले कुछ लोग तो अच्छे होते थे, लेकिन कुछ बैंड बहुत ही चालू टाइप के होते थे। इन चालू टाइप बैंड वालों की विशेषता यह थी कि उनके कई वाद्यों में से आवाज ही नहीं निकलती थी या उनसे कभी भी आवाज फूट पड़ती थी। ऐसे में वे कोई भी गाना बजाएं, उनके बैंड से धुन एक ही निकलती थी। अब ऐसे बैंडवाले फिल्मों में संगीतकार हो गए हैं। 17वीं सदी में औरंगजेब नामक समझदार बादशाह हुआ था, जो इस तरह के संगीत का निष्पक्ष और तटस्थ आलोचक हो सकता था। ये सारे संगीतवाले औरंगजेब की मृत्यु के कई सौ साल बाद पैदा हुए, इसलिए वे अपने उचित मूल्यांकन और इनाम से वंचित रहे। अब हमें इन्हें झेलना पड़ रहा है। मनमोहन सिंह से तो आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह यह काम करेंगे। वह कहेंगे ‘ठीक है’ और एक कमेटी बिठा देंगे।

यहां वैसे भी मुद्दा मनमोहन सिंह नहीं, यो यो हनी सिंह हैं। जैसे मनमोहन सिंह का बोलना जरूरी हो, तब भी वह नहीं बोलते, वैसे ही हनी सिंह को जब चुप रहना चाहिए, तब वह कथित गाने गाते हैं। अब समाज के आम लोगों ने हनी सिंह को चुप करने का बीड़ा उठा लिया है। 2012 के अंतिम दिन एक अच्छा काम हुआ कि जनता की भारी मांग पर हनी सिंह का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। यह वैसी ही खुशी है, जैसी तब होती है, जब आप पाते हैं कि कोई सार्वजनिक शौचालय साफ-सुथरा है और उसकी दीवारें चमचमा रही हैं।

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