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आतंक का शिकार बना पाक पोलियो अभियान

कुलदीप तलवार, वरिष्ठ पत्रकार First Published:31-12-2012 07:26:47 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

पाकिस्तान में पिछले साल ओसामा बिन लादेन की तलाश के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईएस ने जो जाली पोलियो वैक्सीनेशन मुहिम शुरु की थी, उसके बाद से वहां पोलियो ड्रॉप पिलाने का विरोध अब बढ़ता जा रहा है। इसे रोकने के लिए कट्टरपंथियों ने विदेशी समाजसेवी संस्थाओं के कईं कार्यकर्ताओं का अपहरण भी किया और हत्याएं भी की। कट्टरपंथियों का कहना है कि यह मुहिम उनकी जासूसी के लिए है। यह भी अफवाह फैलाई जा रही है कि इसके जरिये बच्चों का बंध्याकरण हो रहा है। दूसरी ओर ये भी कहा जा रहा है कि ये हत्याएं पाक को ‘पोलियो मुक्त’ बनाने से रोकने की साजिश हैं।

हाल ही में कराची, खैबरपख्तूनख्वा प्रांत के पेशावर, रसालपुर, नौशहरा और चारसद्दा में बंदूकधारियों ने गोली मार कर नौ पोलियो कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी हैं जिनमें छह महिलाएं भी शामिल है। कई लोग घायल भी हुए हैं। फिलहाल किसी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली। पाकिस्तानी तालिबान पोलियो मुहिम का हमेशा ही विरोध करते रहे हैं। पहले भी कईं बार इसे रोकने की चेतावनी दी गई थी। इन हत्याओं के बाद सिंध और खैबरपख्तूनख्वा की सरकारों को पोलियो अभियान को बंद करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी पाकिस्तान में अपना पोलियो अभियान रोकने की घोषणा की है।

पाकिस्तान उन तीन देशों मे से एक है जहां पोलियो आज भी एक बड़ी समस्या है। दो अन्य देश हैं- अफगानिस्तान और नाईजीरिया। पाकिस्तान में 2011 में लगभग 200 बच्चे पोलियो का शिकार बने जो पिछले 15 साल में सबसे ज्यादा संख्या है। सरकार विदेशी एजेंसियों की मदद से इस समय तीन करोड़ से ज्यादा बच्चों को 88,000 सेहत कार्यकर्ताओं की मदद से ड्रॉप पिला रही है लेकिन अब अभियान में बाधा आ गई है।

इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो लोग मारे गये हैं वे हथियार नहीं बांट रहे थे और न ही किसी अमेरिकी प्रचार का हिस्सा थे, वे तो केवल पोलियो को जड़ से खत्म करने में सहयोग दे रहे थे। पाकिस्तान की विभिन्न मस्जिदों से जुड़े हजारों इमाम इन हत्याओं पर न केवल सख्त अफसोस जाहिर कर रहे हैं बल्कि विरोध भी जता रहे हैं। उदारपंथी इमामों के संगठन ‘पाकिस्तान उलेमा परिषद’ के प्रमुख ताहिर अशरफी ने कहा है कि हमारे देश की परंपराओं तथा इस्लाम दोनों ही इस तरह की घटनाओं का विरोध करते हैं।

लाहौर के सबसे बड़े मदरसे ‘जामिया मंजूर इस्लामिया’ के मौलाना अब्दुला फारूख ने भी कहा है कि लड़कियों के हत्यारे मुसलमान अथवा इन्सान कहलाने के लायक नहीं है। उन्होंने अपनी मस्जिदों में शहीदों के लिये प्रार्थना की है और जुम्मे की नमाज के बाद दुआएं पढ़ी है। इन बयानों से यह संकेत मिलते हैं कि देश की राजनीति व समाज पर प्रभाव रखने वाले उलेमा आतंकवादियों को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के लिए यह अच्छी शुरुआत हो सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
 
 
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