Image Loading
रविवार, 29 मई, 2016 | 07:30 | IST
 |  Image Loading
ब्रेकिंग
  • भ्रष्टाचार दीमक की तरह है, सपने को चूर चूर करने की ताकत भ्रष्टाचार में: पीएम मोदी
  • बिना कारण देश को निराशा के गर्त में धकेलना दुर्भाग्यपूर्ण: पीएम मोदी
  • लोकतंत्र में विरोध स्वाभाविक है, एक तरफ विकासवाद है तो दूसरी तरफ विरोधवाद है:...
  • मोदी सरकार के दो साल: 'नई सुबह' कार्यक्रम में बोले पीएम मोदी, चुनी हुई सरकार का...
  • केजरीवाल और पीएम मोदी लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं: राहुल गांधी
  • आप विधायक वंदना ने विधानसभा उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, निगम उपचुनाव में हार...
  • दिल्ली में राहुल गांधी की अगुवाई में बिजली और पानी को लेकर कांग्रेस का प्रदर्शन
  • उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत का दावा, जल्द ही सामने आएगी सीडी, भाजपा नेताओं का भी...
  • मोदी सरकार के दो साल: 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' पर बोले अमिताभ, जहां नारी की पूजा होती...
  • मोदी सरकार के दो साल पर बोले केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली, विकास की कोशिश लगातार...
  • उत्तराखंड: टिहरी जिले के घनसाली में बादल फटा, गैंगर गांव के घरों, दुकानों में...
  • वी नारायणसामी पुडुचेरी में कांग्रेस विधायक दल के नेता निर्वाचित, मुख्यमंत्री...
  • बिहार बोर्ड इंटर आर्ट्स का रिजल्ट मार्कशीट के साथ जानने के लिए बने रहें livehindustan.com...
  • बिहार बोर्ड इंटर आर्ट्स का रिजल्ट सबसे पहले हमारे पास, क्लिक कर देखें रिजल्ट
  • कांग्रेस पी चिदंबरम, ऑस्कर फर्नांडिस, जयराम रमेश, अंबिका सोनी, विवेक तन्खा, कपिल...
  • बिहार बोर्ड का रिजल्ट आया, आप भी देखें अपना रिजल्ट यहां click कर
  • बिहार बोर्ड इंटर आर्ट्स का रिजल्ट आया। सिर्फ 56.40 % रहा परिणाम। पिछली साल के...
  • CBSE 10वीं रिजल्ट: CGPA से ऐसे निकालें अपना पर्सेन्टज....Click Here
  • CBSE Class X results: 96.36 प्रतिशत लड़कियां पास हुईं जबकि 96.11 प्रतिशत लड़के पास हुए हैं।
  • भाजपा झूठा जश्‍न मना रही है, इस सरकार ने कोई नए रोजगार नहीं दिएः चिदंबरम
  • पी चिदंबरम ने मोदी सरकार की योजनाओं पर उठाए सवाल, बोले- दो साल में देश का बुरा हाल

देश के असली चेहरे से मुलाकात

गोपालकृष्ण गांधी, पूर्व राज्यपाल First Published:30-12-2012 07:57:20 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

यह साल अब चंद घंटों का मेहमान है। यह हमारे-आपके लिए कहीं बेहतर हो सकता था, लेकिन इसी तरह यह कहीं बदतर भी हो सकता था। हमें इस साल किसी जंग से दो-चार नहीं होना पड़ा और न ही हमें भयानक सूखे या भयावह बाढ़ का शिकार बनना पड़ा, जो लाखों की तादाद में लोगों को उजाड़ देती है। इस वर्ष हमारा साबका सुनामी जैसी कुदरती आपदा से भी नहीं पड़ा, जो सैकड़ों जिंदगियां खत्म कर देती है और अनगिनत लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ फेंकती है। इस साल हम किसी महामारी की चपेट में आने से भी बचे रहे। हम 1966 की ‘कंचनजंगा’ विमान दुर्घटना जैसे हादसों का शिकार बनने से भी इस वर्ष दूर रहे। उस दुर्घटना में होमी जहांगीर भाभा समेत सौ से अधिक लोग मारे गए थे। यह साल 1985 जैसा दुखद वर्ष बनने से भी बच गया, जब एअर इंडिया का विमान-182 ‘कनिष्क’ उड़ान के दौरान हवा में ही विस्फोट का शिकार हो गया था और उसमें मशहूर केमिकल इंजीनियर वाई नयुदम्मा समेत 329 जिंदगियां हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गई थीं।

2012 इस लिहाज से भी खुशकिस्मत रहा कि इसे 1981 में बिहार में बागमती नदी पर हुई भीषण रेल दुर्घटना जैसी त्रासदी या फिर 1991 के गैसल व 1995 के फिरोजाबाद रेल हादसे जैसे हालात का सामना नहीं करना पड़ा। इन दुर्घटनाओं में सैकड़ों मुसाफिर काल के ग्रास बन गए थे। उनमें से न जाने कितने अपने काम पर जाने के लिए निकले होंगे, कितने काम की तलाश में जा रहे होंगे और कितने ही तीर्थयात्रा पर रहे होंगे। इस साल हमें 2004 के कुंबकोणम अग्निकांड सरीखे दर्दनाक हादसे की पीड़ा नहीं भोगनी पड़ी, जिसमें 91 स्कूली बच्चे जिंदा जल गए थे या फिर पिछले साल की कोलकाता के एम्री हॉस्पिटल जैसी दुर्घटना से भी हम सुरक्षित रहे, जिसमें 73 मरीज व उनकी देखभाल करने वाले लोग जलकर या धुएं की घुटन से मारे गए थे। इस साल ने हमें राजनीतिक हत्याओं से दूर रखा, 26/11 जैसी त्रासदियां नहीं हुईं। और खुदा का शुक्र है कि देश के विभिन्न इलाकों में सांप्रदायिक तनावों के बावजूद 2002 जैसे दंगों से हमारा सामना नहीं हुआ।

हम इन सबके लिए इस साल का शुक्रिया अदा कर सकते हैं। नकारात्कम राहत भी कम सुकूनदेह बात नहीं है। लेकिन क्या दर्द का न होना खुशी की आमद है? नहीं! सियासत ने हमें इस साल कोई तसल्ली नहीं पहुंचाई। वैसे राजनीति कभी खुशियां बांट भी सकती है? यह कुछ अविश्वसनीय-सा भले महसूस हो, मगर इस प्रश्न का जवाब है- हां, सियासत ऐसा कर सकती है।

यदि राजनीतिक पार्टियां लोकपाल बिल पर एकराय बना पातीं, तो वाकई इससे देश के लोगों को खुशियां मिलतीं। अगर सियासी जमातें यह कहतीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग हमारी पहली प्राथमिकता है और वे अपने-अपने संगठन के भीतर के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कोई पहल करती हुई दिखतीं, तो यकीनन देश को खुशी होती। राजनीतिक दलों ने यदि यह भी बताया होता कि वे चुनाव खर्च के बारे में निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों का ईमानदारीपूर्वक, जिम्मेदारी व पारदर्शिता के साथ पालन करेंगे, तो उनका यह आचरण देश को प्रसन्न करता।

यदि हमारी संसद ने तीन तरह की अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय किया होता, यानी काला धन, अवैध खनन और गैरकानूनी हथियारों के खिलाफ वह कोई सार्थक कदम उठा पाती, तो देश को जरूर खुशी मिलती। यदि हमारे सांसदों ने सदन की कार्यवाही को बाधित करने और उसका बहिष्कार करने की बजाय सत्ता पक्ष के आगे असुविधाजनक सवाल उछाले होते, तो देश को संतोष होता। लेकिन क्या हमारी संसद ने वैसा काम किया, जैसा उसे करना चाहिए था? यदि वह सचमुच नियमित बैठकें करती, मसलों पर गंभीर बहस करती, संजीदा कानून बनाती, तो देश जरूर खुश होता।

यदि नई पीढ़ी की राजनीति करने वाले युवा नेताओं ने चापलूसी की बजाय वफादारी के नए युग की शुरुआत की होती, घनिष्ठता की जगह बेबाकी व अवसरवादिता की बजाय सेवा की भावना दिखाई होती, तो जरूर इस देश को प्रसन्न होने का मौका मिलता। राजनीतिक क्षेत्र ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। लेकिन सच्चई यह भी है कि जिस तरह हम सभी नागरिकों को एक खांचे में नहीं रख सकते, वैसे ही सभी राजनेताओं को एक ही ब्रश से नहीं पेंट कर सकते। हम और राजनीतिक वर्ग, दोनों ही एक-दूसरे को नीचे ले जा रहे हैं।

जहां राजनीति ने 2012 में हमें निराश किया, वहीं प्रतिस्पर्धाओं से भरे एक अन्य क्षेत्र ने देश को जश्न मनाने के पल दिए और वह क्षेत्र है- खेल। विश्वनाथन आनंद ने जहां विश्व चैंपियन का ताज अपने नाम बरकरार रखकर हमारे आहत मन के लिए मरहम जुटाया, तो वहीं इस साल के ओलंपिक में मैरी कोम ने बॉक्सिंग, साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में कांस्य पदक जीतकर तथा सुशील कुमार ने कुश्ती मुकाबले में रजत पदक जीतकर हमारी जिंदगी में चमक बिखेरी।

खेलों का हमारी जिंदगी पर कितना असर है, इसे हम अक्सर कम करके आंकते हैं। इस महीने की शुरुआत में मैं नीलगिरी की पहाड़ियों के बीच बने एक खूबसूरत स्कूल विद्या वनम में गया था। इसमें पढ़ने वाले साठ फीसदी बच्चे इरूला जनजाति के हैं। उन्हें तमिल और अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है और वे हिंदी भी काफी कुछ समझते-जानते हैं। मैंने उनसे एपीजे अब्दुल कलाम की तरह ही सवाल किया, ‘आप क्या बनना चाहते हैं?’ कई हाथ ऊपर उठ आए। मुझे लगा कि जिस तरह कलाम साहब को जवाब सुनने को मिलते थे, वैसे ही उत्तर मुझे भी सुनने को मिलेंगे- डॉक्टर, इंजीनियर, आईटी एक्सपर्ट, वैज्ञानिक, कभी-कभी राजनेता। लेकिन नहीं। बेहद सधी हुई अंग्रेजी में एक बच्चे ने कहा- सर, मैं फुटबॉलर बनना चाहता हूं।

मैंने पूछा, आपका पसंदीदा फुटबॉलर कौन है? उसने कहा, मैसी। एक और बच्चा मेरे करीब आया। उसने कहा कि वह वॉलीबॉल खिलाड़ी बनना चाहता है। तीसरे का जवाब सुनकर मैं चौंक-सा गया। ‘सर, मैं पक्षी विज्ञानी बनना चाहता हूं। मुझे सालिम अली जैसा बनना है।’ मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ- सालिम..? एक बच्ची ने कहा- मैं डांसर बनना चाहती हूं। उस छोटी-सी लड़की के भीतर एक बालसरस्वती, एक रुक्मिणी देवी थीं। शायद आगे चलकर उसके भीतर से कोई विश्वविख्यात संगीतकार निकले।

उस स्कूल में एक प्रदर्शनी लगी थी, उसमें हिंदी का भी एक स्टॉल था। एक हिंदी पोस्टर के पास खड़ी लड़की से मैंने पूछा, ‘व्हाट इज योर नेम?’ उसने मेरी तरफ देखा और बगैर किसी हिचक के कहा- मेरा नाम दिव्या है। एक तमिल लड़की के मुंह से खड़ीबोली हिंदी सुनकर मुझे भारत की सामंजस्यवादी शक्ति का एहसास हुआ। लंबे अंतराल के बाद मुझे ऐसा अनुभव हुआ था। मैंने अपने आप से कहा कि ये बच्चे ही असली भारत हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
 
 
|
 
 
अन्य खबरें
 
देखिये जरूर
जरूर पढ़ें
Bihar Board Result 2016
Assembely Election Result 2016
क्रिकेट स्कोरबोर्ड
क्रिकेट
कोहली की चुनौती के लिए तैयार है सनराइजर्स का सबसे सफल गेंदबाजकोहली की चुनौती के लिए तैयार है सनराइजर्स का सबसे सफल गेंदबाज
सनराइजर्स हैदराबाद के शुक्रवार को दूसरे क्वालीफायर में गुजरात लायंस पर चार विकेट की जीत के साथ फाइनल में जगह बनाने के बाद तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार ने कहा कि उनकी टीम खिताबी मुकाबले में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलोर की चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं।