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दशक के दूसरे वर्ष का लेखा-जोखा

शशि शेखर shashi.shekhar@livehindustan.com First Published:29-12-2012 06:22:18 PMLast Updated:31-12-2012 01:31:04 PM

इंसानियत के इतिहास में एक साल की अहमियत कम नहीं होती। अब, जब 2012 के गुजरने में कुछ घंटे शेष रह गए हैं, तो क्यों न गुजरे 12 महीनों का विश्लेषण करें? एक विश्व नागरिक की हैसियत से इस दौरान हमने क्या खोया, क्या पाया?

इसमें कोई दो राय नहीं कि 2012 को उम्मीदों से ज्यादा नाउम्मीदी के लिए जाना जाएगा। विज्ञान ने इस दौरान जरूर महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज कराईं, पर साल बीतते-बीतते में दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की जो वारदात हुई, उसने इस वर्ष की बहुत सारी उपलब्धियों को बेमतलब बना दिया।

जेनेवा में वैज्ञानिकों ने बरसों की अथक मेहनत के बाद हिग्स बोसोन कणों को ढूंढ़ निकाला। इसे कुछ लोगों ने ईश्वरीय चमत्कार के समीप पहुंचने का दर्जा दिया, पर अभी बहुत कुछ खोजा और समझा जाना शेष है। सुनीता विलियम्स ने भी अंतरिक्ष में लगभग 322 दिन का सफर तय कर अपने साथियों के साथ न केवल नई और महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं, बल्कि कीर्तिमान भी स्थापित किया। इन दो खासियतों को यदि गुजरते साल के खाते से अलग कर दिया जाए, तो इस कालखंड के अधिकांश हिस्से पर धुंध छाई नजर आएगी।

2008 की मशहूर मंदी के बाद 2011 में भी धरती के आर्थिक मोर्चे पर भूचाल आने शुरू हुए। उम्मीद की जा रही थी कि 2012 में हमारी दुनिया के सत्तानायक कुछ ऐसा रास्ता निकाल लेंगे, जिससे पांच महाद्वीपों में पसरे इंसानियत के हर तबके को सुकून मिलेगा। ऐसा नहीं हो सका। यूरोप पिछले साल की तरह रसातल की ओर ही जाता दिखा। साथ ही यह यक्ष प्रश्न और बुलंद हो गया कि क्या दुनिया पर कायम गोरी चमड़ी के प्रभुत्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं? यूरोप अगर टूटता है, तो तय जानिए कि यह 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ी आर्थिक दुर्घटना होगी और समूची दुनिया इससे प्रभावित होगी। यही वजह है कि जब बराक ओबामा दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे, तो रोमनी के मुकाबले उनकी जीत पक्की लग रही थी, पर वह जोश-जज्बा नदारद था, जिस पर सवार होकर 2008 में वह सत्तानशीं हुए थे। पिछले चुनाव के दौरान जब वह ‘प्रेसिडेंशियल डिबेट’ में पूरे जोश के साथ अपने विचार रख रहे थे, मैं न्यूयॉर्क में था। होटल के उस कक्ष में लाइव टेलीकास्ट देखते हुए मैंने गौर किया था कि वहां के कर्मचारियों के मन में इस शख्स के प्रति गहरे आदर का भाव है। वे मानते थे कि वंचितों के बीच से आया यह व्यक्ति अमेरिका को आर्थिक परेशानी के दलदल से निकालने में कामयाब होगा। वे गलत थे। इस बार ओबामा को ही जीतना था, इसलिए वह जीत गए, पर अमेरिकी निराश हैं। संसार की दूसरी बड़ी आर्थिक ताकत चीन में भी सत्ता परिवर्तन की घोषणा हुई है। हमारा यह पड़ोसी महादेश अमेरिका जैसी जिल्लत से नहीं गुजर रहा, पर उसकी खुशहाली की दीर्घायु पर तमाम सवाल कायम हैं। शी जिनपिंग को यकीनन 2013 में सत्ता संभालते ही इन सवालों से जूझना पड़ेगा।

खुद भारत के लिए यह वर्ष बेहद निराशाजनक रहा। रुपया लगभग पूरे साल धूल चाटता रहा। महंगाई और मुद्रास्फीति ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। आम आदमी की दुश्वारियां बढ़ती गईं और साथ ही नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से हर रोज सुर्खियां बनते गए। 2011 में अनशन कर संसद से सड़कों तक सनसनी फैला चुके अन्ना हजारे फिर मैदान में आ डटे, पर इस बार यह साबित हो गया कि उनका करिश्मा क्षणभंगुर था। उनकी टीम टूट गई और अब केजरीवाल अपनी लड़ाई अलग लड़ रहे हैं। दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घिनौनी वारदात ने पूरे देश को हिलाया, तो भारी संख्या में युवा इंडिया गेट पर उमड़ आए। यह ऐसा ज्वार था, जिसका कोई नेता नहीं था। सोशल नेटवर्किग से संगठित हुए इन नौजवानों ने दिखा दिया कि यह नई पीढ़ी अपना भविष्य खुद तय करना चाहती है। यह ठीक है कि असामाजिक तत्वों ने उनकी हताशा और सक्रियता का गलत फायदा उठाने की कोशिश की, लेकिन वहां से कुछ ही दूरी पर बैठे सत्ताधीशों तक यह संदेश तो पहुंच ही गया कि नई पीढ़ी अब उन्हें हाथ पर हाथ धरकर बैठने नहीं देगी।

राजनीतिक मोर्चे पर भी जहां कई बड़े लोगों की छवि पर आरोपों की कालिख लगी, वहीं कुछ मौजूं परिवर्तन भी हुए। अमेरिका में वंचितों के प्रतीक ओबामा तो जीत गए, पर मायावती को उत्तर प्रदेश चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। इसी तरह साल के आखिरी महीने में नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया कि गांधी के प्रदेश में फिलहाल उनका कोई विकल्प नहीं है। उत्तर प्रदेश और गुजरात के चुनावों से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि देश की जनता के पास सार्थक सियासी विकल्प का अभाव है। उत्तर प्रदेश में लोग अगर मायावती से नाराज थे, तो उनके पास समाजवादी पार्टी को चुनने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उधर मोदी ने खुद को इतना मजबूत कर लिया है कि स्वयं उनकी पार्टी तक उनका कोई तोड़ नहीं खोज सकती। संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

खेल के मोर्चे पर भी इस दौरान हमें निराशा हासिल हुई। क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर और अपनी अगुवाई में विश्व कप जिता चुके महेंद्र सिंह धौनी ने देश की तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया। खेल संघों में फैला हुआ भ्रष्टाचार और गिरोहबंदी लगातार सुर्खियां बनते रहे। दिसंबर के महीने में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ से हमारी बर्खास्तगी पहले से ही शर्मसार हो रहे खेल प्रेमियों को कुछ और आघात दे गई।

मीडिया के लिए तो 2012 बहुत ही खराब रहा। इंग्लैंड में मडरेक के अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड द्वारा कुछ लोगों के फोन टेप करवाने के कारण हंगामा मचा, तो हमारे देश में एक प्रमुख मीडिया घराने के दो संपादकों को जेल की हवा खानी पड़ी। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है, जब इस स्तर के पत्रकारों पर वसूली के आरोप लगे। सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में यह बहस पूरे जोरों पर है कि क्या मीडिया को बेलगाम छोड़ा जाना चाहिए? इस दौरान 80 साल से लोगों की जिंदगी में सार्थक बदलाव ला रही न्यूजवीक मैगजीन ने अपना आखिरी अंक छापा। अब यह पत्रिका कभी कागज पर नहीं छपेगी। उसे सिर्फ इंटरनेट पर पढ़ा जा सकेगा। पश्चिम में जिस तरह से एक-एक कर पत्रिकाएं और अखबार पिंट्र संस्करण बंद कर रहे हैं, उससे तय हो गया है कि कागज पर छपी सामग्री की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।

बॉलीवुड ने इस सबके विपरीत कुछ अच्छी फिल्में दीं। कहानी, बर्फी, गैंग्स ऑफ वासेपुर, एक था टाइगर, इंग्लिश-विंग्लिश, ओह माय गॉड, जब तक है जान आदि फिल्मों ने न केवल हमारा मनोरंजन किया, बल्कि गमजदा हिन्दुस्तानियों को सिनेमाघर के अंधेरे में कभी आंसू बहाकर हल्के होने का अवसर दिया, तो कभी खिलखिलाकर हंसाया, ताकि वे तनाव मुक्त हो सकें। इस दौरान हमने गुजरे जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना और पौरुष के प्रतीक रहे दारा सिंह को खो दिया। दोनों लंबे समय से अस्वस्थ थे और फिलहाल इंडस्ट्री में सार्थक भूमिका निभाने में नाकामयाब भी। राजेश खन्ना की अंतिम यात्रा में जो भीड़ उमड़ी, उससे साबित हो गया कि आप अगर अच्छा काम करते हैं, तो बरसों बाद भी लोग उसे सराहते रहते हैं।

तय है, 2012 अच्छा नहीं गुजरा। पर इंसानी जिंदगी में ऊंच-नीच तो चलती ही रहती है। आपको नए साल की शुभकामनाएं! उम्मीद है, 2013 बेहतर साबित होगा और उसे अच्छा बनाने में कुछ योगदान हमारा-आपका भी होगा।

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