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हिंदी लेखक यानी तुसी ग्रेट हो जी

सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार First Published:29-12-2012 06:21:20 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

हिंदी महान है। हिंदी में सब महान हैं। उसका साहित्य महान है। उसके पाठक महान हैं। हिंदी महानता की शैली है। महानता उसका स्वभाव है। हिंदी का हर लेखक पैदा होते ही महान कहलाने लगता है। यकीन न हो तो लेखकों के जीवन परिचय पढ़ लीजिए। प्रत्येक जीवन पग पग पर महानता का परिचय देता है। यहां हिंदी का हर साहित्यकार प्रात:स्मरणीय होता है। चिर वंदनीय होता है। नित्य पूजनीय भी होता है। वह या तो ‘श्रीयुत’ होता है या ‘श्रीमद्’ होता है या ‘श्रीमानजी’ होता है। उसका जीवन अनेक प्रकार की ‘श्री’ से शोभित होता है।

परिचय की पहली लाइन इस तरह से ही लिखी आती है: ‘आदरणीय फलां जी का जन्म फलां गांव स्थित फलां परिवार में अमुक तिथि में हुआ था।’ जाहिर है कि हिंदी का साहित्यकार अपने जन्म के साथ ही अपना पूरा नाम लेकर पैदा होता है। ‘बड़े सुकुल’ से लेकर ‘मंझले और छोटे सुकुल’ तक सब पूरे नाम के साथ अवतीर्ण होते रहते हैं। वे ‘लल्ला’ ‘कुक्कू’ ‘मिट्ठ’ नहीं होते। ‘जीवन परिचय’ बताते हैं कि जब कोई साहित्यकार पैदा हुआ तत्क्षण वह न केवल साहित्यकार हुआ बल्कि अपना नाम और उपनाम धारण कर मैदान में आया। यह है हिंदी का स्टायल!

अयोघ्या प्रसाद सिंह हरिऔध हों या प्रसाद या प्रेमचंद या निराला या कोई और या अपने परम प्रिय पांडे जी सब अपना प्रॉपर नाम, उपनाम लेकर पैदा होते हैं। हिंदी का साहित्यकार बचपन से ही पूरा पैकेज लेकर आता है। जीवन परिचय की शैली महानता की हर पल रक्षा करती है। हिंदी का साहित्यकार ‘अवतारी’ होता है। उस पूत के पांव अक्सर पालने में ही दीखने लगते हैं। वह ‘होनहार’ होता है। एकमुखी होते हुए भी ‘बहुमुखी प्रतिभा का धनी’ होता है- अनेकमुखी! अनंतमुखी!!

प्रतिभा जन्मजात होती है: ‘उन्होंने घर पर संस्कृत, अंग्रेजी और फारसी की शिक्षा ग्रहण की’ या आजकल के चलन के अनुसार ‘उन्होंने पहले अंग्रेजी में एमए किया’ इत्यादि सूचनाएं कुछ इस तरह से दी जाती हैं कि न भी पढ़ते तो भी महान होते। फिर जीवन परिचय इस तरह आगे बढ़ता है: ‘वे बड़े ही प्रतिभाशाली थे। बचपन से ही उन्हें साहित्यिक संस्कार मिले थे। उनके परिवार में साहित्यिक वातावरण हुआ करता था। प्रतिभा के धनी बालक फलां जी ने बचपन में ही कई भाषाएं सीख लीं थीं। लिखने पढ़ने का चाव शुरू से था। पांच साल की उम्र में ही वे कविता करने लगे थे। ‘देखा: बचपन में ही वे सब कुछ हो गए थे!’ जीवन परिचय महानता की फैक्ट्री है। पूरा साहित्य इस कला का प्रोडक्ट है। हिंदी साहित्यकार की बड़ी लेंग्वेज देखिए। उसकी वेशभूषा देखिए। उसका बोलना सुनिए। हर पल हर जगह से महानता टपकती है। महानता हिंदी वाले का आशुगीत है। इसीलिए अलेक्जेंडर द ग्रेट या अशोका दी ग्रेट की तर्ज पर वह ‘लेखक द ग्रेट!’ कहलाता है।

हिंदी में हर लेखक का ‘व्यक्तित्व’ होता है। जिसका व्यक्तित्व होता है उसी का तित्व होता है। व्यक्तित्व के साथ कृतित्व की ऐसी प्रगाढ़ तुक बैठती है कि व्यक्तित्व ‘टू इन वन’ का मजा देता है। कृतित्व के कारण साहित्यकार कृती कहलाता है। कृती से ‘करतन कला’ निकलती है। ‘करतनी’ कटिंग-पेस्टिंग के काम आती है। कृती यानी कटपेस्ट करने वाला ‘पेस्टर’!
जीवन परिचय ने ‘द ग्रेट’ बना दिया वरना लेखक ‘पेस्टर’ ही कहलाता

 

 
 
 
 
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