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बदला और शांति

राजीव कटारा First Published:28-12-2012 07:31:34 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

अपनी सीट पर निढाल से वह बुदबुदाए जा रहे थे। ‘मैं उसे कतई नहीं छोड़ंगा। मुझे बदला लेना है। जब तक मैं बदला नहीं ले लेता। मेरे दिल में ठंडक नहीं पड़ेगी।’ क्या बदला लेने से ही हम शांत हो सकते हैं? सोशल साइकोलॉजिस्ट केविन कार्लस्मिथ का कहना था कि बदला हमें इसलिए चाहिए कि उससे हमें शांति मिलेगी। लेकिन उस मकसद के लिए बदला उलटा ही काम करता है। वह कॉलगेट यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए थे। पिछले साल ही 44 साल की उम्र में कैंसर ने उन्हें हमसे छीन लिया। उनकी एक रिसर्च बेहद चर्चित रही है, ‘द पैराडॉक्सिकल कॉन्सिक्वेन्शेज ऑफ रिवेन्ज।’ दरअसल, कार्ल की रिसर्च कह रही थी कि ऊपर से ऐसा जरूर लगता है। लेकिन बदला लेने की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हम लगातार उसी ‘शख्स’ के बारे में सोचते रहते हैं।

उससे हम पीछा नहीं छुड़ा पाते। उस शख्स से जुड़ा दुख या पीड़ा लगातार हमारे साथ चलती रहती है। लेकिन जब हम उसे ‘जाने भी दो कह कर’ आगे बढ़ जाते हैं, तो ज्यादा शांति महसूस करते हैं। हमें जिंदगी में आगे बढ़ना ही होता है। हम एक जगह पर अटक कर नहीं जी सकते। यह अटकाव हमारे जिंदगी के लिए अच्छा नहीं है। अगर कोई चीज हमें अटका कर रखती है, तो हमारा ही नुक्सान करती है। हमें जिंदगी में बहुत सारी चीजें करनी पड़ती हैं। बदला कभी हमारा मकसद नहीं हो सकता।

बिना भूले और भुलाए जिंदगी आगे नहीं बढ़ती। अगर हम उस पर ठीक से नहीं सोचते हैं, तो अपने लिए ही दिक्कत खड़ी करते हैं। होता यह है कि हमारी जिंदगी आगे बढ़ जाती है और हम कहीं ठहरे खड़े रह जाते हैं। मान लो वहीं खड़े रह कर हम बदला लेने में कामयाब भी हो जाएं। तब जो जिंदगी इतनी आगे निकल गई है, उसका क्या होगा? क्या अपने पिछड़ेपन से हमें कभी शांति मिल सकती है?

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