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असुरक्षा और खतरों से घिरी व्यवस्था

भरत वर्मा, एडीटर, इंडियन डिफेंस रिव्यू First Published:27-12-2012 07:12:17 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

भारत इस्लामी कट्टरपंथी शासन, उभरती कम्युनिस्ट महाशक्ति और सैन्य तानाशाह-तंत्र से घिरा हुआ है। पड़ोस की ये तानाशाह शासन भारत के बहु-सांस्कृतिक लोकतंत्र से काफी भिन्न और विपरीत हैं। ऐसे में भारत का मॉडल एशिया में सफल होता है तो तानाशाही मॉडल अपने आप दबाव में आ जाएगा। इसलिए भारत को अस्थिर करने की निरंतर प्रक्रिया चलती रहती है। अगर तानाशाही मॉडल की जीत होती है, तो लोकतंत्र का भारतीय मॉडल हार जाएगा और इससे पूरे एशिया में तानाशाही तंत्र का खौफ बढ़ जाएगा। इसके अलावा, इस्लामी कट्टरपंथी शासन और चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही, दोनों के उद्देश्य समान हैं- भारत को अस्थिर करना। एशियाई जमीन पर अमेरिका ने जो अपनी धाक बनाई है, उस पर काबिज होना ही चीन की मंशा है। उसका दूसरी मंशा है, भारत को उसके ही उपमहाद्वीप तक सीमित कर देना। इसके लिए वह पाकिस्तान का इस्तेमाल भी कर रहा है। भारतीय विदेश नीति की दिशाहीनता को देखते हुए ही उसने नेपाल पर अपना वर्चस्व बनाया है और श्रीलंका में पर्याप्त निवेश किए हैं। अब वह मालदीव व अफगानिस्तान में भारतीय प्रभावों को कमतर करने पर तुला है। दरअसल, सुनियोजित सैन्य आधुनिकीकरण से वह दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों में शामिल हो चुका है।

इस लिहाज से वह पाकिस्तान की मदद से भारत के लिए दोनों दिशा से खतरा है। फिलहाल दोनों इस ताक में हैं कि नाटो फौज अफगानिस्तान से निकल जाए। ऐसा होते ही तालिबान के जरिये पाकिस्तानी फौज अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लेगी। इसके बाद वह भारत में बड़े पैमाने पर आतंकियों का खेप भेजा जा सकेगा। इस लिहाज से चीन ने साल 2012 में भारत को मात दे दी है। इस साल देश की आंतरिक सुरक्षा व स्थिरता पर खतरा बढ़ा है। म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल के रास्ते माओवादियों, आतंकियों, आपराधिक गुटों, असंतुष्टों व स्लीपर एजेंटों को असलहा-बारूद व धन मुहैया होते रहे हैं। ऊपर से खुफिया तंत्र व पुलिस-प्रशासन की नाकामी से यह चुनौती और भी बढ़ी है। जन-आंदोलनों में हमने देखा कि एक ओर जहां राजनेता वोट-बैंक राजनीति में उलझे रहे, वहीं दूसरी ओर समाज के विभिन्न तबके अलग-अलग मुद्दों पर बंटे हुए थे। यह सब बेहतर प्रशासन न देने की बाबूशाही का नतीजा था। इसी नौकरशाही व संकीर्ण योजनाओं के चलते फौज की हालत खराब हो रही है।

इस साल भी उन्हें जरूरी हथियार, मसलन, उन्नत राइफल और कार्बाइन उपलब्ध नहीं कराए गए। जमीन से लेकर हवा तक की रक्षा प्रणाली पुरानी पड़ चुकी है। अच्छी तोप से लेकर माउंटेन रडार और लड़ाकू एयरक्राफ्ट तक की कमी है। वायु सेना में तो ट्रेनर की मांग बनी ही हुई है। यही नहीं, रक्षा मंत्रलय द्वारा की गई कटौती के चलते नौसेना के बेड़े में कन्वेंशनल सबमैरीन नहीं हैं। कमी व कुप्रबंधन की सूची काफी लंबी होती जा रही है। फिलहाल भारतीय सेना में लगभग दस हजार अधिकारी कम हैं। हैरत की बात यह है कि एक सघन आबादी व उच्च बेरोजगारी दर वाले देश में भी तीस हजार जवानों की कमी है। अकेले नौसेना में दो हजार अफसरों व 15 हजार नाविकों की जगह खाली है। इसी तरह से वायुसेना में करीब एक हजार अधिकारी और सात हजार एयरमैन कम हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि फौज के कई पुराने महारथी हताशा में अपने युद्ध पदक लौटा रहे हैं, क्योंकि वे रक्षा मंत्रालय से अपनी वैध देय राशि प्राप्त नहीं कर सकते। रक्षा बजट में कम आवंटित राशि और पूरी प्रक्रिया में बढ़ती लाल फीताशाही की बदौलत रक्षा सेवा की हालत चरमराई है। नतीजतन, सैन्य टुकड़ियों के बीच की आपसी एकता व तालमेल पर असर पड़ा है, जबकि ये दो तत्व युद्ध के दौरान निर्णायक जीत के लिए जरूरी होते हैं। इस तरह के माहौल में जहां हथियार और मानव-संसाधन की भारी कमी है, वहीं सशस्त्र बलों में हताशा व नैतिक पतन की स्थिति बढ़ती जा रही है। इसलिए सेना फिलहाल इस हालात में नहीं है कि वह चीन द्वारा या दो मोर्चो पर एक साथ, आसन्न संकट का मुकाबला कर सके। इस तरह से साल 2012 भारत की घटती सैन्य क्षमताओं व कई गुणा बढ़ते खतरों का साक्षी रहा है। यही नहीं, प्रशासनिक चूक की वजह से आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

भारत में भ्रष्टाचार और वोट बैंक की राजनीति चरम पर पहुंच गई है। प्रशासनिक तंत्र के हर महकमे में भ्रष्टाचार के मामले उछल रहे हैं। वोट बैंक राजनीति का सबसे बेहतर उदाहरण रहा- बांग्लादेशियों के गैरकानूनी प्रवास के खिलाफ असम में आंदोलन व हिंसा का भड़कना। जवाबी कार्रवाई के तौर पर पूर्वोत्तर के लोगों को धमकियां मिलने लगीं और फिर बंगलुरु, हैदराबाद व मुंबई जैसे शहरों से पूवरेत्तर के लोगों का जबर्दस्त पलायन हुआ। इसी तरह से पाकिस्तानी हिंदू अपनी सुरक्षा के लिए भारत भाग रहे हैं। आगे चलकर इससे भी सामाजिक तानाबाना प्रभावित हो सकता है।
भारतीय नागरिक प्रशासन केवल माओवादियों के बढ़ते खतरे के प्रति असहाय नहीं है, बल्कि पूरे देश में कानून-व्यवस्था को टूटते देखने को भी अभिशप्त है।

अलबत्ता, भारतीय पुलिस को आपराधिक गुटों या सशस्त्र माओवादियों से लड़ने के लिए न तो प्रशिक्षित और न ही हथियारों से सुसज्जित किया गया है। दरअसल, इस औपनिवेशिक युग में पुलिस ढाचे और उनके सशस्त्रीकरण की प्रक्रिया शिथिल कर दी गई है, जबकि गैंगेस्टर या आतंकवादी 21वीं सदी की तकनीकों से लैस होते जा रहे हैं। ऐसे भी सबूत मिले हैं कि माओवादी, आतंकवादी और कश्मीर में बगावत फैलाने वाले लोग एक-दूसरे के संसाधनों का इस्तेमाल अपने-अपने हित में करते हैं। वहीं दूसरी तरफ, अपने देश में तो अलग-अलग खुफिया एजेंसियों, अलग-अलग राज्यों, केंद्र और राज्य व यहां तक कि फौज और नागरिकों के बीच तालेमल का अभाव है। तभी तो पुलिस व फौज की क्षमताएं सिकुड़ रही हैं और तेजी से उपद्रवी गुट बढ़ रहे हैं।

यह सही है कि पाकिस्तान की तबाही का कारण वहां की फौज है। उसी तरह यह भी सही है कि हमारी नौकरशाही की हरकतें भी भारतीय संघ को गिराने पर आमादा है। इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए हमें अपने अंदर भारतीयता के सोए हुए भाव को जगाना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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