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मन की शांति

ब्रह्मकुमार निकुंज First Published:27-12-2012 07:09:23 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

साइलेंस प्लीज। यह शब्द बचपन से हम स्कूल, कॉलेज व कचहरी में सुनते आए हैं। दो अक्षरों वाले इस शब्द ‘शांति’ के पीछे कौन-सा गहरा राज छिपा  है? शांति क्या है, इस पर दुनिया में आज तक बहुत कुछ सोचा और विचारा गया है, लेकिन कोई नहीं जान पाया कि शांति को हासिल कैसे किया जाए? यह भी पहेली है कि वास्तव में सच्ची शांति किसे कहेंगे? मनुष्य क्या उसे अपने जीवन में हासिल कर सकता है? आध्यात्मिक दृष्टि से यदि देखा जाए, तो इंसान के भीतर की दिव्य शक्ति (आत्मा) और परम दिव्य शक्ति (परमात्मा) के बीच के सेतु संवाद को ‘यथार्थ शांति’ कहा गया है। आध्यात्मिक शांति की गहराई में जाने से हम अनमोल हीरे-मोती प्राप्त कर सकते हैं। जैसे भौतिक शरीर के लिए सांस लेना जरूरी है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर के लिए शांति की अनुभूति करना अति आवश्यक है। शांति हमारी मानसिक व भावनात्मक ऊर्जा को चरम बिंदु तक ले जाती है, जिससे हम बिंदु स्वरूप में स्थित होकर परमानंद की अनुभूति कर सकते हैं।

आंतरिक शांति के बिना हम कठपुतली की तरह विभिन्न बाहरी परिस्थितियों के तारों से यहां-वहां खिंचते रहते हैं। शांति एक दर्पण की तरह है। दर्पण किसी की भी आलोचना नहीं करता, सभी चीजों का सच्च प्रतिबिंब हमें दिखाता है और हमें सभी प्रकार के व्यर्थ विचारों के जाल से मुक्त होने में मदद करता है। अत: मन की सच्ची शांति की अनुभूति के लिए हमें सर्वप्रथम अपने भीतर जाकर अपने अनंत आत्मिक स्वरूप में स्थित होने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करके हम विस्मृत हुई भावनाओं और स्मृतियों को फिर से प्रतिबिंबित व जागृत कर मगन अवस्था में लीन होकर परमानंद व प्रेम के झूले में झूलकर आत्मिक तृप्ति का अनुभव कर सकते हैं। यही आत्मिक तृप्ति फिर विश्व शांति का आधार बनती है। इसीलिए ज्ञान से आलोकित आत्माओं का कहना है कि ‘मन की शांति ही सच्चा सोना है।’

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