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सड़कों पर उमड़े युवा आंदोलन की राजनीति

बद्री नारायण, प्रोफेसर, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद First Published:26-12-2012 09:30:05 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

दिल्ली की ठिठुरती ठंड में नौजवान प्रदर्शनकारियों का हुजूम जिस तरह इंडिया गेट पर उमड़, उसने सबको हैरान किया। पिछले कुछ वक्त से ऐसे आंदोलनों का बढ़ता चलन यह संकेत दे रहा है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका व प्रासंगिकता कम हुई है। ऐसे आंदोलनों से एक और संकेत मिलता है कि जनता के एक तबके में अपने हितों के लिए संघर्ष करने की जागरूकता बढ़ी है।

ऐसे आंदोलन बनते कैसे हैं? आमतौर पर ऐसे आंदोलनों को ‘साइबर मोबेलाइजेशन’ से उत्पन्न माना जाता है। ऐसे आंदोलनों में किसी प्रकार के राजनीतिक नेतृत्व के सक्रिय न होने की बात की जाती रही है। लेकिन अगर आप गहराई से देखें, तो ऐसे आंदोलनों का भी अपना नेतृत्व होता है। हो सकता है कि यह नेतृत्व कांग्रेस, भाजपा जैसे राजनीतिक दलों का न हो, पर इनके नेतृत्व में अक्सर सामाजिक हितों के लिए लडम्ने वाले राजनीतिक समूह की भूमिका होती है।

अक्सर वामपंथी नेटवर्क, एनजीओ वगैरह इसमें सक्रिय दिखाई देते हैं। पर इनमें नेतृत्व एक नहीं होता, बहुल होता है। यही उसकी शक्ति है और सीमा भी। शक्ति इसलिए, क्योंकि ऐसे आंदोलनों में नेतृत्व के बहुल स्तर सक्रिय होते हैं, जो उसका प्राण तत्व है, जो उसे आम लोगों से जोड़ता है। सीमा, यह कि इसमें एक नेता या बड़े नेता के न होने के कारण इसे किसी दिशा में ले जाना मुश्किल होता है।

ऐसे आंदोलनों से संवाद मुश्किल होता है। इनसे सुलह-समझौता मुश्किल होता है। इसका एक फायदा यह है कि ऐसे में समझौतापरस्त नेतृत्व नहीं बन पाता। यदि विश्व स्तर पर देखें, तो फ्रांस में साठ के दशक में फैले युवा प्रदर्शनों में पहले वामपंथी और समाजवादी विचारों से जुड़े छात्र व बुद्धिजीवी हुए थे और फिर आम लोग भी आकर जुड़ गए थे। वहां भी नेतृत्व का कोई एक केंद्र नहीं था।

दामिनी कांड के विरुद्ध हुए ताजा आंदोलन के टीवी फुटेज को अगर गहराई से देखें, तो शुरू में आइसा, एसएफआई, एडवा, एपवा जैसे वामपंथी संगठनों के प्लेकार्ड दिखाई दे रहे थे। फिर बिना संगठन के नाम वाले कार्डबोर्ड लिए छात्र-छात्राएं और आम लोग इसमें बढ़ने लगे। फिर प्लेकार्ड वाले भागीदारों की संख्या बढ़ती गई। फिर इसमें इधर कई राजनीतिक हित वाले दलों की अप्रत्यक्ष भूमिका बढ़ने लगी।

इस आंदोलन में एक तरफ संगठित छात्र-युवा शक्ति और आम जनता की शांतिपूर्ण प्रदर्शन संस्कृति दिख रही है, तो वहीं दूसरी तरफ स्पष्ट राजनीतिक हितों से जुड़े हिंसा फैलाने के मकसद से आए छात्रों व युवाओं को साफ-साफ पहचाना जा सकता है। नुक्कड़ नाटक और जनगीतों से यह साफ होता है कि इसमें संगठित वैचारिक समूह सक्रिय थे। इसलिए यह आंदोलन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के संदेशों से अपने आप शुरू नहीं हो गया था, इसमें कई संगठनों के ‘मल्टी सेंटर्ड’ नेतृत्व की भूमिका अहम थी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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