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गलत मत कदम बढ़ाओ, सोचकर चलो

First Published:26-12-2012 09:28:55 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

कुछ लोग हड़बड़ी में कुछ भी कह-बोल देते हैं और कोई भारी गड़बड़ हो जाती है। कई लोग ऐसी गलती नहीं करते, वे हर काम काफी सोच-समझकर, पूरा वक्त लेकर करते हैं और ज्यादा भारी गड़बड़ कर देते हैं।

हमारा सौभाग्य है कि हमारी सरकार चलाने वालों पर हम यह आरोप नहीं लगा सकते कि वे अगंभीरता से जल्दबाजी में फैसले करते हैं। वे सड़क पार करते वक्त पहली कक्षा में बताए मुताबिक पहले दाहिनी तरफ देखते हैं, फिर बाईं तरफ, फिर दाएं देखते हैं, फिर बाएं देखते हैं, फिर दाहिनी और बाईं तरफ देखते हैं और आखिरी बार दाहिनी तरफ देखकर सड़क पार करते हैं। यह बात और है कि इस बीच एक बस दाएं से चली आती है और उन्हें टक्कर मारकर चली जाती है।

हमारे गृह मंत्री के घर के बाहर आग लग जाए, तो वह तुरंत पानी की बाल्टी लेकर नहीं दौड़ेंगे। वह सोचेंगे कि अगर आज मैं पानी की बाल्टी लेकर दौड़ा, तो कल असम में कहीं आग लगेगी, तो मुझसे यह उम्मीद की जाएगी कि मैं बाल्टी लेकर दौड़ूंगा। परसों महाराष्ट्र में आग लग सकती है, उसके अगले दिन माओवाद ग्रस्त बस्तर के जंगलों में आग लगेगी, तो मैं कहां-कहां दौड़ूंगा। फिर वे तय करते हैं कि पानी की बाल्टी लेकर दौड़ना अच्छा फैसला नहीं होगा? इस बीच हो सकता है कि उनके घर सहित दो-चार घर और जल जाएं।

ऐसी ही दूर की सोच प्रधानमंत्री की भी है। वह सोचेंगे कि पहले देख लेते हैं कि आग कितनी दूर तक फैलती है। हो सकता है कि वह अपने आप ही बुझ जाए। दो दिन बाद भी आग जलती रही, तो वह सोचेंगे कि पानी डाला जाए, या फूंक मारी जाए। गंभीर विचार के बाद वह तय करेंगे कि पानी ही ठीक रहेगा। फिर यह विचार करेंगे कि कितना पानी डाला जाए, एक चम्मच काफी होगा, एक ग्लास डालना होगा या एक बाल्टी की जरूरत होगी।

सलाह करने के बाद वह तय करेंगे कि कुछ भी किया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि आग में सब कुछ जलकर राख हो चुका है। पर उन्हें बताया जाएगा कि बतौर पीएम उन्हें कुछ तो करना होगा। तब वह चम्मच भर पानी ले जाकर अंगारों पर डालेंगे और पूछेंगे- ‘ठीक है?’
राजेन्द्र धोड़पकर

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