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शनिवार, 06 फरवरी, 2016 | 12:50 | IST
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  • IPL नीलामी: ट्राविस हेड को रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने 50 लाख में खरीदा।
  • IPL नीलामी: आर.पी. सिंह को पुणे सुपर जायंट्स ने 30 लाख में खरीदा।
  • IPL नीलामी: अभिमन्यु मिथुन को सनराइजर्स हैदराबाद ने 30 लाख में खरीदा।
  • IPL नीलामी: बरिंदर सरन को सनराइजर्स हैदराबाद ने 1.2 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: काइल एबट को किंग्स XI पंजाब ने 2.1 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: जयदेव उनादकट को कोलकाता नाइट राइडर्स ने 1.6 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: मुस्ताफिजुर रहमान को हैदराबाद सनराइजर्स ने 1.4 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: मारकस स्टॉयनिस को किंग्स XI पंजाब ने 55 लाख में खरीदा।
  • IPL नीलामी: कारलोस ब्रेथवेट को दिल्ली डेयरडेविल्स ने 4.2 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: जो बर्न्स, डेविड हस्सी, डेरन ब्रावो, एडम वोग्स, ओवेस शाह, एंड्रयू टाय को...
  • IPL नीलामी: अजंता मेंडिस, नेथन लायन, देवेंद्र बिशू और सुलेमान बेन
  • PL नीलामी: गेंदबाज मोहित शर्मा को किंग्स XI पंजाब ने 6.5 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: गेंदबाज प्रवीण कुमार को गुजरात लायंस ने 3.5 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: जॉन हेस्टिंग्स को कोलकाता नाइट राइडर्स ने 1.3 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: धवल कुलकर्णी को गुजरात लायंस ने दो करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: मिशेल मार्श को पुणे सुपर जायंट्स ने 4.8 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: डेरन सैमी और थिसारा परेरा को किसी ने नहीं खरीदा।
  • IPL नीलामी: कोलिन मुनरो को कोलकाता नाइट राइडर्स ने 30 लाख में खरीदा।
  • IPL नीलामी: रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने स्टुअर्ट बिन्नी को 2 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: दक्षिण अफ्रीकी क्रिस मोरिस को दिल्ली डेयरडेविल्स ने 7 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: जेसन होल्डर, रवि बोपारा और तिलकरत्ने दिलशान को किसी ने नहीं खरीदा।
  • IPL नीलामी: ऑलराउंडर इरफान पठान को पुणे जायंट्स ने 1 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: ऑलराउंडर मनोज तिवारी को किसी ने नहीं खरीदा।
  • IPL नीलामी: ब्रैड हेडिन पर किसी ने बोली नहीं लगाई।
  • IPL नीलामी: मुशफिकुर रहीम पर किसी ने बोली नहीं लगाई।
  • IPL नीलामी: इंग्लैंड के खिलाड़ी जोस बटलर को मुंबई इंडियंस ने 3.8 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: विकेटकीपर संजू सैमसन को दिल्ली डेयरडेविल्स ने 4.2 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: माइकल हसी, महेला जयवर्धने, जॉर्ज बेली और एस.बद्रीनाथ पर किसी ने नहीं...
  • IPL नीलामी: हाशिम आमला पर किसी ने नहीं लगाई बोली।
  • IPL नीलामी: चेतेश्वर पुजारा पर किसी ने बोली नहीं लगाई।
  • IPL नीलामी: दक्षिण अफ्रीका के डेल स्टेन को गुजरात लायन्स ने 2.3 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: युवराज सिंह को सनराइजर्स हैदराबाद ने 7 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: आशीष नेहरा को सनराइजर्स हैदराबाद ने 5.5 करोड़ में खरीदा।
  • IPL नीलामी: ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर एरन फिंच पर किसी ने नहीं लगाई बोली।
  • IPL नीलामी: मार्टिन गप्टिल पर किसी ने नहीं लगाई बोली।
  • IPL नीलामी: ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर शेन वॉटसन को रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने 9.5 करोड़...
  • IPL नीलामी: पुणे सुपर जायन्ट्स ने इशांत शर्मा को को 3.8 करोड़ में खरीदा
  • IPL नीलामी: पुणे सुपर जायन्ट्स ने केविन पीटरसन को 3.5 करोड़ में खरीदा

नई सोच से टकराती पुरातन राजनीति

राजेन्द्र धोड़पकर, एसोशिएट एडिटर, हिन्दुस्तान First Published:25-12-2012 08:03:39 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

राजनीति और समाज के बारे में भविष्यवाणी करना खतरनाक होता है। जब देश में टेलीविजन और संचार साधनों की आमद हुई, तो समाजशास्त्रियों व कुछ राजनीतिज्ञों ने कहा था कि अब जन-आंदोलनों के दिन लद गए। अब लोग सब कुछ टीवी से पा लेंगे और सड़कों पर नहीं निकलेंगे। कुछ अरसे तक यह भविष्यवाणी सही भी होती दिखी। अब ऐसा लगता है कि इसकी वजह आधुनिक संचार साधन नहीं थे, बल्कि मंडल व मंदिर आंदोलनों की हिंसा से पैदा हुई स्तब्धता थी। सोवियत साम्राज्य के टूटने से व्यवस्था परिवर्तन की विचारधाराएं भी कमजोर हो गईं। लेकिन अब फिर भारत में जन-आंदोलन जोर पकड़ने लगे हैं। संचार साधन इन आंदोलनों में रुकावट नहीं बने, बल्कि इन्हें फैलाने में मददगार साबित हुए हैं।

अच्छा या बुरा जो भी हो, सच्चाई यही है कि आंदोलन हो रहे हैं और शायद भविष्य में भी होंगे। कोई नहीं जानता कि कौन-सी घटना किसी आंदोलन की चिनगारी बन जाए। दिल्ली में 16 दिसंबर को हुए सामूहिक बलात्कार ने जनता की किसी दुखती रग को छेड़ दिया और न जाने कब से संचित गुस्सा, अपमान, असुरक्षा और उपेक्षा की तकलीफ फूट पड़ी। जो आंदोलन खड़ा हुआ, वह किसी संगठन या नेता के पीछे नहीं आया। उसकी कोई विचारधारा नहीं थी। यहां तक कि कोई तार्किक मांग भी नहीं थी। वह सिर्फ गुस्से और पीड़ा की अभिव्यक्ति थी। चाहे वह सरकार-प्रशासन हो या फिर समाज के सोचने-विचारने वाले तबके, सब इसे समझने और इससे मुखातिब होने में चूक गए। चूक इसलिए भी हुई कि ऐसे आंदोलन, चाहे वह भ्रष्टाचार विरोधी हों या बलात्कार के विरुद्ध, ये नए किस्म के आंदोलन हैं और इन्हें पुराने आंदोलनों की तरह आंकने से गलती ही होगी। सच यह है कि देश और समाज आगे बढ़ गया है और नेता और विचारक पीछे छूट गए हैं। यह खाई न बढ़े और संवादहीनता एक बड़ी समस्या न बन जाए, इसके पहले शायद इस नए जमाने को उसकी शर्तो पर समझना होगा।

अगर आंदोलन टीवी से या एसएमएस से या फेसबुक से बढ़ता-पनपता है, तो किसी के नकारने या आलोचना करने से यह वस्तुस्थिति बदल नहीं जाएगी। पहली बात तो यह है कि ऐसे आंदोलन नेता और संगठन से नहीं चलते। गंभीरता से देखें, तो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी अन्ना हजारे के नेतृत्व में नहीं चला था। अन्ना बस उसके प्रतीक बन गए थे और जब अन्ना नेता बने, तो आंदोलन बिखर गया। वह आंदोलन भी स्वत:स्फूर्त था, लोग अपनी इच्छा से रामलीला मैदान पहुंच रहे थे। उसी तरह बलात्कार के खिलाफ गुस्से का इजहार करने वाला आंदोलन भी स्वत:स्फूर्त था। लोग दिल्ली की भारी ठंड में ठंडे पानी की बौछारों और पुलिस की लाठियों को झेलने पहुंच गए थे। यह भी सही है कि ये लोग ज्यादातर मध्यवर्गीय लोग हैं, इसलिए इनकी आलोचना भी होती है। मध्यवर्गीय लोग घरों में बैठे रहें, तब भी उनकी आलोचना होती है कि वे घरों से नहीं निकलते। आंदोलन करते हैं, तब वही लोग कहते हैं कि यह मध्यमवर्गीय लोगों का आंदोलन है।

यूं भी अगर हमारे मध्यवर्गीय लोग आधुनिक ‘ज्ञान अर्थव्यवस्था’ के युग में देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाते हैं, तो उन्हें अपनी मांगों को रखने का भी पूरा हक है। इन आंदोलनों की कोई ठोस मांग नहीं है। व्यवस्था परिवर्तन की मांग तो कतई नहीं है, जिस पर कुछ पुराने लोगों को ऐतराज है। इन लोगों की कोई विचारधारा नहीं है। विचारधारा वाले लोग शायद अब आदिवासी क्षेत्रों के बाहर कोई आंदोलन नहीं खड़ा कर सकते, क्योंकि आदिवासी क्षेत्र अब भी पुराने जमाने में ही हैं। विकास की धारा उन्हें ज्यादा कंगाल कर गई है।

आदिवासियों के बीच माओवादी आंदोलन का भी उद्देश्य माओवादी कम्युनिस्ट समाज बनाना नहीं है। वह आदिवासियों के छूट जाने की पीड़ा और गुस्से की अभिव्यक्ति है। मध्यवर्गीय आंदोलनों की प्रत्यक्ष कोई मांग न हो, कोई विचारधारा न हो, लेकिन इनमें जनता की एक मांग छिपी होती है। यह जनता सरकार से ज्यादा जवाबदेही व संवेदनशीलता चाहती है। वह व्यवस्था बदलना नहीं चाहती, बल्कि उसे सुधारना चाहती है। यह पुराने क्रांतिकारियों को बुरा लग सकता है, लेकिन अब दुनिया में लगभग कोई भी आंदोलन कथित व्यवस्था को बदलने का नहीं चल रहा। सारे आंदोलन ज्यादा जवाबदेह और सच्च लोकतंत्र चाहते हैं। इसलिए सरकार जब पुराने सरकारी अंदाज में उनसे रूबरू होती है, तो आंदोलन और भड़क उठते हैं।

हमारे यहां सरकार चलाने वाले लोग पुराने सामंती अंदाज के ‘माई-बाप सरकार’ के अंदाज में राज करते हैं, जबकि जनता ज्यादा लोकतांत्रिक राज चाहती है। सरकार लोगों से मुखातिब होते समय यह सोचती है कि सामने वाले की हैसियत कितनी है और उससे किस तरह की औपचारिकता बरती जाए, जबकि जनता यह मानती है कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को हर एक नागरिक के लिए जवाबदेह होना चाहिए। दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति अगर एक पुलिस कांस्टेबल को एक बीयर पर अनौपचारिक बातचीत करने के लिए बुलाकर किसी संवेदनशील विवाद को खत्म कर सकता है तो भारत का गृहमंत्री आंदोलनकारियों की हैसियत क्यों देखता है? जो मामला अनौपचारिक बातचीत से सलुझ सकता है उसे लाठी-पानी की बौछारों और इंडिया गेट को किले में बदल कर क्यों सुलझाया जाता है। सरकार मानती है कि वह जनता की शासक है और जनता मानती है कि वे हमारे प्रतिनिधि हैं।

यह फर्क सरकार चलाने वालों को समझना होगा। क्योंकि विवाद इसी समझ के फेर से ज्यादा गंभीर हो रहे हैं। जनता जिस बात पर भड़की है वह सिर्फ एक बलात्कार की जघन्य वारदात नहीं है। समस्या यह है कि सरकार दिनों दिन तातकवर और पैसे वालों की प्रतिनिधि दिखती जा रही है और जनता की जिद यह हे कि वह हमारी प्रतिनिधि है। यह सवाल भी जनता के मन में है कि पोंटी चड्ढा और नामधारी जैसे लोगों को सरकारी पैसे से निजी सुरक्षाकर्मी दिए गए और उन सुरक्षाकर्मियों ने बाकायदा छतरपुर के गोलीकांड में हिस्सा लिया। एक तो ऐसे संदिग्ध लोगों को सरकारी सुरक्षा क्यों मिले, और अगर सुरक्षा की जरूरत है तो वे लोग इतने हैसियत वाले हैं कि निजी सुरक्षाकर्मी अपने पैसे से रख सकते हैं। सरकारी सुरक्षा की जरूरत उन लोगों को है जो आपराधिक चरित्र के नहीं हैं और जिनकी अपने निजी बाउंसर रखने की हैसियत नहीं है, जो बसों और मेट्रो में सफर करते हैं।

अपने अपनों की खैरात बांटने और आम जनता की उपेक्षा करने वाली सामंती व्यवस्था इक्कीसवीं शताब्दी के मिजाज के अनुकूल नहीं है, न ही जनता अब जनप्रतिनिधियों को अपने शासकों की तरह देखती है। बराबरी वाले नागरिकों की तरह संवाद से ही इन आंदोलनोंसे निपटा जा सकता है, या कि तमाम मुश्किलों के हल की शुरुआत ईमानदार संवाद में ही हो सकती है।

 

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