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नरेंद्र भाई तो जीत गए, पर..

प्रवीण कुमार सिंह First Published:24-12-2012 07:13:22 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

नरेन्द्र भाई जीते तो मेरे मन में भी लड्ड फूटे। नरेन्द्र भाई की जीत फिसड्डियों पर ताकतवर की जीत है। नपुंसकों पर पुरुषार्थ की। द्वारिका गुजरात में है। नरेन्द्र भाई पुन: द्वारिकाधीश बन गये हैं। द्वारिका के आगे देव धरा हिमाचल के जय-विजय का क्या मायने है? कहा जा रहा है कि गुजरात में हर तरफ खुशियां ही खुशिया है, गमगीन कोई नहीं। नरेन्द्र भाई मोदी आपणो गुजरात के शेर है। भले ही गीर के शेर को गुजरात से बाहर जाने की इजाजत न मिली हो, पर यह शेर भारत भर के जंगलों पर राज करना चाहता है। पहले से मौजूद इन जंगलों के बूढ़े शेर परेशान है कि गुजरात का ये गर्वीला शेर उनमें से हर एक को ग्रास कर जायेगा। साप-बिच्छू, गीदड़-भालू, यहा तक कि खरगोश-चूहा तक जंगल छोड़कर भागने को तैयार है। मोदी भाई की खूबी भी तो यही है कि वे अपने वन-क्षेत्र में इकलौते ही रह सकते हैं। पर उस निर्जन जंगल में उसका दहाड़ सुनेगा कौन? उसे वनराज पुकारेगा कौन?

जिस विकास के फार्मूले पर मोदी भाई ने गुजरात फतेह किया है, उसी विकास के प्रेम में चन्द्रबाबू नायडू और बुद्धदेव बाबू पटखनी खा गये। नहीं तो बंगाल में चटख लाल को हरा करना नामुमकिन था। इसी में मनमोमहन सिंह के नाक तक पानी आ गया है। नरेन्द्र भाई का कमाल देखिये ‘विकास’ व हिन्दुत्व का ऐसा कॉकटेल बनाया कि ‘छै करोड़‘ गुजराती उसे गटक गये। इधर कांग्रेस मुख्यालय के गलियारो में भी लोग चहकते-फुदकते नजर आने लगे है। मानो उन्हें 2014 की वैतरणी पार करने का फार्मूला मिल गया हो।

हिमाचल से आ रही बयार उन पर शिलाजीत की तरह काम करने लगी है। उधर नरेंद्र भाई भी कम परेशान नहीं हैं। नंगे, भूखे बाकी देश में इस फॉर्मूले को कैसे अंजाम दिया जाय? वहां की जनता ससुरी तो 2002 के लिए भी तैयार नहीं दिखती। इन्हीं उधेड़बुन में टीवी ऑन किया। पर यह क्या? आज तो न्यूज बिल्कुल बदल गई है। टीआरपी की होड़ में अब जिंदगी और मौत से लड़ रही बलात्कार की शिकार लड़की की कहानी थी। छात्र नौजवान विजय चौक पर नारे लगा रहे थे। टीवी एंकर भी वहीं मस्त थे।

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