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वोट काल का कोटा-न्याय

गोपाल चतुर्वेदी First Published:23-12-2012 07:05:53 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

कल एक सज्जन सरकार को जी भरकर कोस रहे थे, ‘पेंशन के पत्र का उत्तर नहीं मिलता। जब जाओ, तो कभी बाबू तो कभी अफसर गायब।’ वह खुद भी कभी सरकार में थे। उनका मानना है कि प्रशासन अब एक डूबता हुआ जहाज है। उसमें जगह-जगह भ्रष्टाचार के छेद हैं। हमने पूछा कि इस डूबते जहाज को बचाने का कोई उपाय है क्या? उन्होंने बताया, ‘नेता इसी उपक्रम में जुटे हैं, यह जो प्रमोशन में आरक्षण लाया जा रहा है, उसका उद्देश्य है कि व्यवस्था जल्दी से बदले।’

कल तक वह आरक्षण के विरोधी थे। आज पक्षधर कैसे हो गए, हमें आश्चर्य हुआ। फिर हमें खयाल आया कि सरकार में गिरगिट की सिफत है, तो कर्मचारी में भी होगी ही। कार्यरत हो या सेवानिवृत्त। उसे निष्ठा बदलते देर नहीं लगती। वह चहके, ‘अभी दलित व आदिवासियों को प्रोन्नति का कोटा मिला है, कल पिछड़ों को भी मिलेगा। सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक प्रक्रिया में आज नहीं तो कल सैकड़ों साल पहले किए अत्याचारों के दोषियों को दंड मिलना ही चाहिए। संख्या बल का सवाल जो ठहरा!’

यह जुर्म और सजा की उनकी अवधारणा अपने पल्ले नहीं पड़ी। नश्वर संसार में सभी इंसानों में एक ही असमानता है। कुछ अल्पायु होते हैं, तो कुछ दीर्घायु। लेकिन मृत्यु का शिकार तो सबको बनना ही बनना है। फिर यह कैसा इंसाफ है कि ‘लमहों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई?’ वह भी अलग-अलग पीढ़ियों के अनजान लोगों ने। सैकड़ों साल पहले अपराध संता ने किए थे और उसके लिए बंता आज भला क्यों उठक-बैठक लगाए?

इतने में वह भूत सरकारी सेवक खुद ही बोला, ‘सारे के सारे सियासी दल वोट के सौदागर हैं। जिस वृक्ष पर बैठे हैं, उसी की जड़ों में पारस्परिक विद्वेष का मट्ठा डाल रहे हैं। वह भी जातिहीन समाज बनाने के नाम पर। एक न एक दिन तो उसे ढहना ही ढहना है। सियासी सामाजिक इंसाफ दरअसल सिर्फ घर भरने की जुगत है। प्रशासन का ढांचा कार्यकुशल हो या निकम्मा, उससे क्या! नौकरी में प्रारंभिक आरक्षण तो समझ में आता है, पर प्रमोशन में? यह वोट काल के कोटा-न्याय में ही मुमकिन है!

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