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ये कौन मदरसों पर काबिज है

रोजिना खानम, समाज सेविका First Published:21-12-2012 08:15:38 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

दो महीने पहले मैं पाकिस्तान गई थी। मेरा मायका कराची में है। रात में अकेले घर से निकलने की बात की, तो घरवालों ने हिदायत दी कि किसी मर्द का साथ होना जरूरी है। पता चला तालिबानियों के फरमान ने लोगों के जेहन में खौफ पैदा कर दिया है। यकीन नहीं हुआ कि यह वही पाकिस्तान है जहां शहरों की कौन कहे दूर दराज के इलाकों में भी बिना किसी खौफ के लड़कियां देर रात तक सड़कों पर अकेले ही आती जाती थीं। तब भी ज्यादातर लड़कियां और महिलाओं का लिबास सलवार, कुर्ता और हिजाब पहनावा होता था। लेकिन, अकेले आने जाने पर कोई पाबंदी महिलाओं और लड़कियों पर नहीं थी। आज तालिबानी कहते हैं कि बिना पुरुष के महिलाएं घरों से बाहर न निकलें। लेकिन वे इमरजेंसी के वक्त क्या करें जिनके घर में जरूरत के वक्त कोई पुरुष मौजूद न हों?

1973-1985 के दौरान का  वक्त मेरे जेहन में कौंध जाता है, जब मैं कराची के हैप्पी होम इंग्लिश स्कूल में पढ़ती थी। वहां हमें हर तरह की आजादी थी।  सिर्फ पढ़ाई की ही नहीं, बल्कि खेल और कव्वाली की भी। हमारे बैंड ग्रुप्स भी हुआ करते थे। लड़कियों के पसंदीदा खेलों में क्रिकेट, स्कवैश, हॉकी आदि थे। उन दिनों स्कवैश के मशहूर खिलाड़ी जहांगीर खान हमारे आइडल हुआ करते थे। ऐसा भी नहीं था कि ये छूट केवल स्कूलों की चारदीवारी तक ही सीमित थे, बल्कि इंटर कालेज और इंटर स्टेट प्रतियोगिताएं भी हुआ करती थीं। जिसमें खासी संख्या में लड़कियां शिरकत करती थीं। खासकर पेशावर, क्वेटा और लाहौर की लड़कियां अपने दमखम के बल पर प्रतियोगिताओं में बढ़िया प्रदर्शन करती थीं।

तब मदरसे दो शिफ्ट में चला करते थे। सुबह सात बजे से दोपहर एक बजे तक और फिर एक से पांच बजे शाम तक। दीनी तालीम लेने के लिए मैं भी मदरसे गई थी। तब उन मदरसों में पढ़ाने वाले मौलाना जानकार और जहीन होते थे। उनकी शैक्षिक योग्यता मास्टर डिग्री हुआ करती थी। भले ही वो दीनी तालीम देते थे परंतु उन्हें गणित में महारत हासिल थी। कई बार तौ मै उनसे अपना होमवर्क करा लेती थी। घरों में पढ़ाने आने वाले मौलाना और मुअज्जिम भी पढ़े लिखे होते थे। हम वहां पर पढ़ाई के साथ-साथ समाज और बड़ों से व्यवहार का सलीका भी सीखते थे।

ये मौलाना स्थानीय होते थे लेकिन आज हालात बदल गए हैं। मदरसों में पढ़ाने वाले मौलाना कम पढ़े लिखे होतें हैं। ज्यादातर मदरसों से स्थानीय मौलाना गायब हो गए हैं। तालिबान के बढ़ते वर्चस्व का पता इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इन स्थानीय मदरसों में उन्होंने अपने आदमी नियुक्ति किए हैं। जो दीनी तालीम के नाम पर कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहें है। आखिर कहां गए स्थानीय मौलाना? क्या अचानक पाकिस्तानी समाज में जानकार मौलानवों की कमी हो गई है या इनके पीछे मकसद कुछ और है?

पहले तालीम आम और खुली थी। लड़के और लड़कियों के अलग-अलग स्कूल थे, को एजुकेशन वाले भी स्कूल थे। कराची से लेकर नार्थ वेस्ट फ्रंटियर तक यही हालात थे। लड़किया दीनी तालीम लेने के लिए मदरसों में जाया करतीं थी। और यही वजह थी कि पाकिस्तान में लिट्रेसी रेट काफी अच्छा रहा। बदले हालात में अब घर वाले लड़कियों को बाहर पढ़ने नहीं भेजते बल्कि अब मौलाना उनको घर ही पढ़ाने आते हैं। ये कौन लोग हैं इससे जिनका हित सधता है?

इस्लाम में कभी भी मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा पर पाबंदी नहीं रही है। खुद पैंगबर महोदय(सल.) की दोनो बीबियां स्कालर थीं। हजरत आयशा इस्लाम पैंगबर साहब की बीबी होकर वे छात्रों को पढ़ाती थीं। उस समय उनके 200 शिष्य थे। इनमें प्रमुख थे हजरत अबू हरीसा, हजरत अब्दुल बिन असवान। यह भी जिक्र है कि हजरत आयशा ने 210 हदीसें भी लिखीं हैं। इसी तरह हजरत खदीजा भी हैं जिन्हें मदर आफ इस्लाम कहा जाता है। माना जाता है कि कपड़े का व्यवसाय करने वाली वह दुनिया की पहली महिला थीं।

हुजूर ने कभी उन्हें इस काम से रोका नहीं। यानी की उस जमाने में मुस्लिम महिलाएं शर्म और हया के दायरे से व्यवसाय कर सकतीं थीं। तो फिर आज के जमाने में शिक्षा पर रोक क्यों? हमें यह समझना होगा कि यदि मां नहीं पढ़ेगी तो मुल्क की तरक्की कैसे होगी। पर्दें में रहकर भी पढ़ाई मुमकिन है। इसलिए इसपर बैन नहीं होना चाहिए। इस्लाम ऐसा पहला धर्म है जिसने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया है।

ये कोई 1969 की बात है जब राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक की सत्ता पर पकड़ ढीली पड़ रही थी। और मुहाजिर कौमी मोवमेंट परवान चढ़ रहा था। माजिद और पठान तथा शिया और सुन्नी में फासला बढ़ रहा था। अमन और सुकून की जगह दहशत लेता जा रहा था। 1986 तक हालात यह थे कि मुहरर्म की दसवीं तारीख तक सुन्नियों के मुहल्ले में सबीलें बनतीं थीं। और जो लोग जूलूस में शामिल होते थे सुन्नी उन्हें अपने हाथों से पानी पिलाते थे और हूजुर में सबील पेश करते थे। लेकिन आज यह खौफ दिलों में है कि कहीं ये ह्ययूमन बम तो नहीं है। सोच में यह बदलाव क्यों आया है यह कहना संभव नहीं है? यकीनन यह दहशतगर्द हमारे मुल्क के नहीं हैं। उस दौर के चंद फैसलों की वजह से पाकिस्तान में तालिबान का वजूद कायम है। बाहरी लोगों के इरादे नापाक हैं। उनका मकसद पाकिस्तान में तालीम की जड़ों को काटकर बर्बाद करना है।

मेरा मानना है कि मौजूदा हालात के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हमारे दीनी तालीम में कमी है। और कहीं न कहीं कोई ताकत है जो हमें भरमा रही है। इन तत्वों को जिहाद करना ही है तो गरीबी मुसलिफी के खिलाफ क्यों नहीं करतें? इस्लाम में यह मान्यता है कि जंग फतह करने के बाद विरोधियों की औरतों, बच्चों और बूढ़ों को माफ करना होता था, लेकिन आज जेहाद के नाम पर अपनों को खून बहाया जा रहा है।
 

 
 
 
 
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