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फिर भुला दिए गए भ्रष्टाचार विरोधी बिल

अंजलि भारद्वाज, सचिव, एनसीपीआरआई First Published:19-12-2012 10:15:54 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

हाल के वर्षों में उजागर हुए घोटालों के अंबार ने न सिर्फ देश को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया, बल्कि भारत के भ्रष्टाचार विरोधी नियामक तंत्र की नाकामी को भी गहराई से स्पष्ट किया है। देश के पास आज ऐसी कोई भ्रष्टाचार विरोधी माकूल एजेंसी नहीं है, जो पर्याप्त अधिकारों, संसाधनों से लैस हो और पूरी तरह आजाद भी। दूसरी तरफ, पेंशन न मिलने, राशन में अनियमितता, सड़क टूटने, सीवर जाम होने या पानी कम आने जैसी रोजमर्रा की परेशानियों व शिकायतों के निपटारे के लिए कोई प्रभावशाली तंत्र न होने से लोगों में नाराजगी बढ़ती ही जा रही है। साफ है, देश को एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी व शिकायत निवारक ढांचे की जरूरत है, जो किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति की जवाबदेही सुनिश्चित कर सके और लोगों की सरकार से जुड़ी रोज-रोज की शिकायतों का हल प्रभावी तरीके से तय समय के भीतर कर सके।

पिछले दो वर्षों में कई आंदोलन हुए और देश के नागरिकों ने जन-दबाव के जरिये अपनी मांग रखी कि इन समस्याओं से निपटने के लिए उपयुक्त कानून बनाया जाए। परिणामस्वरूप, भ्रष्टाचार विरोधी व जन-शिकायतों के निपटारे से संबंधित कई विधेयक संसद में पेश किए गए और उन पर बहसें हुईं। लोकपाल बिल, व्हिसिल ब्लोअर प्रोटेक्शन बिल तथा ज्यूडिशियल स्टैंडर्ड ऐंड अकांउटेबिलिटी बिल को लोकसभा ने पारित कर दिया है और अब वे राज्यसभा में हैं, जबकि जन-शिकायत निपटारा विधेयक लोकसभा के पास है।

संसद का मानसून सत्र तो लगभग पूरी तरह व्यवधानों की भेंट चढ़ गया था। हालांकि लोकपाल और व्हिसिल ब्लोअर प्रोटेक्शन बिल इस वक्त चल रहे सत्र यानी शीतकालीन सत्र के विधायी एजेंडे में शामिल हैं, पर अभी तक इन विधेयकों पर चर्चा नहीं हो सकी है। जिस तरह से भ्रष्टाचार के कृत्य निरंतर जारी हैं और इसे उजागर करने वाले लोग लगातार शिकार बनाए जा रहे हैं, उन्हें देखते हुए तत्काल इन विधेयकों को संसद से पारित करने की आवश्यकता है।

लोकपाल बिल को बजट सत्र में ही राज्यसभा की सेलेक्ट कमेटी को भेजा गया था, ताकि विवाद के मुद्दों के हल ढूंढ़े जा सकें। इनमें वे मुद्दे भी शामिल थे, जो प्रस्तावित लोकपाल के अधिकारों से संबंधित हैं। प्रस्तावित विधेयक में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपे जाने की बात कही गई है। मगर सीबीआई सरकार से स्वतंत्र एजेंसी नहीं है। विधेयक सीबीआई की जांच पर नजर रखने और उसे निर्देश देने का अधिकार लोकपाल को सौंपने की बात तो करता है, मगर अब तक के अनुभव यही कहते हैं कि इस तरह के अधिकारों का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक कि लोकपाल को सीबीआई पर प्रशासनिक नियंत्रण न दिया जाए। विशेष रूप से नियुक्ति, तबादला और हटाने के साथ सालाना गोपनीय रिपोर्ट लिखने का अधिकार। पिछले महीने सदन में पेश अपनी रिपोर्ट में सेलेक्ट कमेटी ने इस समस्या के मद्देनजर संशोधन के लिए कुछ उपयोगी सुझाव दिए, हालांकि यह सीबीआई पर लोकपाल के पूर्ण नियंत्रण से कम है।

बहरहाल, सेलेक्ट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह अनुशंसा की है कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए एक चयन मंडल (कोलेजियम) गठित किया जाना चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और देश के प्रधान न्यायाधीश शामिल हों। यकीनन यह एक सराहनीय सिफारिश है। सेलेक्ट कमेटी ने यह भी अनुशंसा की है कि लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारियों के तबादले लोकपाल की अनुमति के बाद ही किए जाएं। फिर भी ये अनुशंसाएं इस सुझाव से काफी दूर हैं कि ऐसे सीबीआई अधिकारियों की नियुक्ति या बर्खास्तगी लोकपाल की इजाजत के बाद ही हो। कमेटी की यह रिपोर्ट लोकपाल द्वारा प्रेषित मुकदमों की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारियों की सालाना गोपनीय रपट लिखने का अधिकार भी लोकपाल को नहीं सौंपती। यह अत्यधिक चिंता की बात है कि सरकार ने सेलेक्ट कमेटी की इस सिफारिश को भी खारिज कर दिया है, जिसमें भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में जुटे अधिकारियों के तबादले के लिए लोकपाल की अनुमति को जरूरी बताया गया है।

सेलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट यह अनुशंसा करती है कि राज्य सरकारों के लिए यह बाध्यकारी हो कि संघीय कानून की अधिसूचना जारी होने के एक साल के भीतर वे अपने प्रदेश में लोकायुक्त कानून बनाएंगी, लेकिन उस कानून की रूपरेखा क्या हो, यह तय करने की आजादी राज्यों को दी गई है। चूंकि आम आदमी, खासकर गरीब व हाशिये पर पड़े लोगों को ज्यादातर राज्य एजेंसियों के भ्रष्टाचार का शिकार बनना पड़ता है, ऐसे में एक अलग भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी बनाने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए लोकपाल बिल में ही राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति का प्रावधान होना चाहिए और वह भी बिल्कुल लोकपाल की तर्ज पर। जिस तरह से ‘प्रिवेंशन ऑफ करप्शन ऐक्ट’ एक केंद्रीय कानून है, ठीक वैसी ही प्रक्रिया भ्रष्टाचार से निपटने के लिए समूचे देश में अपनाई जानी चाहिए। यह बहुत जरूरी है कि संसद में इन जटिल मसलों पर गंभीर बहस हो और एक उपयुक्त लोकपाल बिल जल्दी से जल्दी पारित किया जाए।

लोगों की शिकायतों के समयबद्ध व प्रभावी निपटारे से संबंधित ग्रीवान्स रिड्रेस बिल संसद के पिछले सत्र में ही लोकसभा में पेश किया गया था। इसे स्थायी समिति के हवाले किया गया था और अब समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। यदि यह विधेयक उपयुक्त संशोधनों के साथ पारित होता है, तो यह मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे संबंधित कानून में यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि सभी सरकारी संस्थाएं व्यापक विचार-विमर्श के बाद सिटीजन चार्टर तैयार करें। इस कानून को प्रभावी बनाने के लिए इसमें जिला स्तर पर एक स्वतंत्र अधिकारी नियुक्त करने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके पास गलती करने वाले सरकारी मुलाजिमों को दंडित करने का अधिकार हो। जिला स्तर के इन अधिकारियों पर राज्य स्तरीय शिकायत निवारण आयोग का नियंत्रण हो।

आरटीआई कानून के बनने के बाद बड़ी संख्या में लोग सरकारी सूचनाओं तक पहुंच रहे हैं और वे नए-नए घोटालों के खुलासे कर रहे हैं। ऐसे में, व्हिसिल ब्लोअर्स पर हमले और उनकी हत्या की घटनाओं में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। इसलिए व्हिसिल ब्लोअर बिल को तत्काल पारित करना चाहिए, ताकि इस कानून को जल्दी से जल्दी लागू किया जा सके। इसी तरह, हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई के लिए एक स्वतंत्र व प्रभावी तंत्र की जरूरत है। द ज्यूडिशियल स्टैंडर्ड ऐंड अकाउंटेबिलिटी बिल संसद के सामने है। इस पर गहन बहस करके कानून बनाने की जरूरत है। यह देश के कानून निर्माताओं की जिम्मेदारी बनती है कि वे जल्दी से जल्दी इन कानूनों का निर्माण करें और देश को भ्रष्टाचार विरोधी बहुप्रतीक्षित हथियार मुहैया कराएं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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