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उनका दोष बस यह है कि वे निम्न जाति के हैं

First Published:19-12-2012 10:15:01 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

पांच साल पहले जब मैं पूर्वी चंपारण के गांव रामपुर बैरिया गया, तो वहां के अल्लाहपुर टोला में रहने वाले गरीब लोग एक हादसे से गुजरे थे। आधी रात को उनकी झोपड़ियों पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी गई थी। यह मामला अब तक न्यायालय में लंबित है। तब उन लोगों ने बताया था कि गांव में एक मस्जिद है, जहां नमाज के वक्त भी गरीब मुसलमानों को केहूनी लगाकर पीछे की सफ (लाइन) में धकेल दिया जाता है। बड़े लोग कहते हैं कि उनको हमारा बदन महकता है। हमारे बच्चों को भी मदरसे में तंग किया जाता है। उनका कहना था कि ये सारे जुल्म इसलिए हो रहे हैं कि वे बड़े लोगों की बैठ-बेगारी नहीं करना चाहते। यहां तक कि एक लड़की की शादी के समय बारातियों की यह कहकर पिटाई की गई कि रजील (छोटी जात) का दूल्हा मारुती कार में सवार होकर उनके दरवाजे से कैसे गुजर सकता है? शादी में बने पुलाव-गोश्त में भी बड़े लोगों ने मिट्टी मिला दी। थाने में शिकायत की, तो गरीब मुसलमानों को ही हाजत में बंद कर दिया गया। उन गरीब मुसलमानों ने मुङो अपने टोले में बनी फूस की मस्जिद भी दिखाई और बताया कि जब हम लोगों ने अपनी इस मस्जिद की तामीर की, तो उन लोगों ने आकर इसे यह कहते हुए गिरा दिया कि छोटे से इस गांव में दो अजान कैसे हो सकती हैं? यह भी झमेला पैदा किया कि इस मस्जिद की जमीन उनकी है। बाद में अधिकारियों के हस्तक्षेप से उनकी मस्जिद फिर से बनी।

बाद में मैंने अपने एमपी लैड के पैसे से उस गरीब बस्ती में एक सामुदायिक भवन बनवाया। इसी सामुदायिक भवन में मदरसा भी चलने लगा। इस टोले के लिए शिक्षा विभाग ने प्राथमिक विद्यालय भी स्वीकृत कर दिया। मुखिया को यह बात गवारा नहीं थी कि रजीलों के बच्चे पढ़ें-लिखें। इसलिए वह पैरवी-पैसे के बल पर उस स्कूल को अपने मुहल्ले में उठाकर ले गया। फिर रोज-रोज का झगड़ा चलने लगा और मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। अपने नामांकन में पूरी जानकारी न देने के लिए मुखिया के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत की गई। तफ्तीश में तेजी आई, तो हिंसा भी बढ़ी। पिछले दिनों अकबर अली नाम के एक विकलांग को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया।

मुखिया और उनके समर्थकों के हमलावर होने का तात्कालिक कारण भले यह रहा हो, मगर बुनियादी सवाल यह है कि यदि इस्लाम धर्म मसावात (बराबरी) और भाईचारे का मजहब है, इसमें कोई जात-पात, ऊंच-नीच नहीं है, तब ये सारी बीमारियां हमें क्यों दिख रही हैं? कोई अपने को क्यों आला जात समझता है, तो किसी को अदना, हकीर-फकीर और रजील? यहां भी जात जन्मना क्यों बन गई है? और मरने के बाद भी पीछा क्यों नहीं छोड़ती? जिस तबके पर जुल्म हो रहा है, अंत में उसे आगे आना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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