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जटिलता के पार

नीरज कुमार तिवारी First Published:19-12-2012 10:13:31 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

यह मेरे बस का नहीं। इससे तो अच्छा है कि मैं वह काम कर लूं, भले ही उसमें कम लाभ है। ऐसी सोच हममें से ज्यादातर का स्वभाव है। इस स्वभाव के कारण ही हम जीवन में पिछड़ते चले जाते हैं। ऐसे कामों का भंडार जमा हो जाता है, जिन्हें हम जटिल समझकर छोड़ चुके होते हैं। ऐसे स्थगित काम भी ढेरों होते हैं, जिन्हें हमने आसान समझकर करना तो शुरू किया, लेकिन थोड़ी बाधा आते ही उसे पेंडिंग में डाल दिया।

नेटवर्क साइंटिस्ट और पारिस्थितिकी तंत्र विज्ञानी एरिक बलरे कहते हैं कि सरल हमेशा जटिल के उस पार मिलता है। उनका कहना है कि जैसे ही आप जटिल चीजों को अपनाते हैं, उसके सरल होने का रास्ता खुल जाता है। वह कहते हैं कि जैसे ही आपके सामने कोई जटिल काम आए, आप उत्साहित हों और राहत महसूस करें। आपके भीतर यह भावना रची-बसी होनी चाहिए कि काम को तो आपको करना ही है। पर कोई काम जटिल क्यों समझा जाता है? जवाब एक है, क्योंकि बाधा को पार करने की गहन, प्रबल और सच्ची इच्छा नहीं होती। अगर बात इससे उलट होती है, तो हम पाते हैं कि अरे! इससे निपटने के तो कई रास्ते हैं। यहां सुकरात को याद करना चाहिए, जिन्होंने बुद्धि हासिल करने से जुड़े एक प्रश्न के जवाब में अपने छात्र को बताया कि ‘जब तुम बुद्धिमानी को उतना चाहने लगोगे, जितना कि पानी में डूबते समय हवा को चाहा जाता है, तो यह तुम्हें हासिल हो जाएगी।’ आज के प्रेरक वक्ताओं में एक जोसेफ मर्फी कहते हैं कि आपके भीतर जटिल समङो जाने वाले काम को सरलता से करने की प्रबल इच्छा है, तो आप 51 प्रतिशत दूरी तय कर चुके हैं। हम एक प्रतिशत भी दूरी तय नहीं कर पाते और वापस चल देते हैं। एरिक कहते हैं कि आप जटिलता को स्वीकारेंगे, तभी चीजों में गहरे उतर सकेंगे। उन तहों तक, जिनका महत्व हमेशा ऊपरी परतों से कई गुना अधिक होता है।

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