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कारों के इस बढ़ते कारवां को रोकना होगा

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री First Published:13-12-2012 09:59:00 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

वर्ल्ड बैंक की एक नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के शहर कारों की बढ़ती संख्या से पैदा हो रही परेशानियों से निपट पाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में, परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए कारगर सार्वजनिक परिवहन और अन्य अभिनव तरीके तलाश करना जरूरी हैं। शहरों में कारों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसे जानने के लिए हमें विश्व बैंक की जरूरत नहीं है। कार निर्माताओं के संगठन सियाम का कहना है कि नवंबर 2012 के अंत में देश की सड़कों पर एक करोड़ 90 लाख कारें दौड़ रही थीं। हर महीने डेढ़ लाख से भी अधिक कारों की बिक्री हो रही है।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के आकलन के अनुसार, छोटी कारों की कम कीमत व सरलता से उपलब्ध बैंक लोन के कारण दोपहिया से उठकर चार पहिया वाहन की सवारी करने के इच्छुक एक करोड़ 40 लाख परिवारों के कदम कार खरीदने के लिए आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। वह भी तब, जब तंग सड़कों के कारण छोटे-बड़े सभी शहरों में ट्रैफिक जाम परेशानी का सबब बना हुआ है। दरअसल, कारों की पार्किग शहरों की बड़ी समस्या बनी हुई है। ऐसे में, आगे यह सिलसिला पता नहीं कहां जाएगा? इसके अलावा, प्रदूषण का मसला भी है और पेट्रोलियम के आयात पर हम जो विदेशी मुद्रा खर्च करते हैं, उसने देश की अर्थव्यवस्था के लिए काफी परेशानियां खड़ी कर दी हैं।

ऐसे में, यह सिलसिला बहुत दिन तक नहीं चल सकेगा। देश के सभी शहरों में ऐसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था जरूरी है, जिससे कारों की जरूरत को कम किया जा सके। देश के तकरीबन सभी छोटे-बड़े शहरों के एक प्रतिशत में भी सार्वजनिक परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। साल 1951 में देश में बिकने वाले हर दस में से एक वाहन बस होती थी, आज ऐसे हर सौ वाहनों में केवल एक बस है। यह बताता है कि देश मेंसार्वजनिक परिवहन की क्या भूमिका रह गई है। दूसरी ओर, दुनिया के अधिकांश विकसित व विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से लोग बड़ी संख्या में लाभान्वित हो रहे हैं। जापान की राजधानी टोक्यो में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल प्रतिदिन 80 लाख से अधिक लोग करते हैं और कहीं कोई परिवहन व्यवस्था संबंधी चिंता पैदा नहीं होती है। यही नहीं, लंदन, सिंगापुर, सिडनी आदि में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था इतनी अच्छी हो चुकी है कि अधिकांश लोग अपने कार्यालयों में आने-जाने के लिए उसी का उपयोग करते हैं।

अब हमें बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) व मेट्रो रेल जैसी सुविधाओं को बनाने-बढ़ाने की कोशिश करनी होगी। इन व्यवस्थाओं में कम वाहनों से अधिक लोग सरलता से आवागमन कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर कई और भी समाधान खोजे जा सकते हैं, पर कारों के कारवां को रोकना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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