Image Loading
सोमवार, 30 मई, 2016 | 18:10 | IST
 |  Image Loading
ब्रेकिंग
  • कोलकाता: बर्धमान में पटरी से उतरी हावड़ा-रांची इंटरसिटी ट्रेन
  • गुड़गांव और मानेसर मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड में प्लांट में आग लगने के कारण...
  • मालेगांव ब्लास्ट केसः साध्वी प्रज्ञा की जमानत पर 6 जून को सुनवाई होगी
  • प्रत्युषा बनर्जी खुदकुशी मामलाः सुप्रीम कोर्ट ने राहुल राज की अग्रिम जमानत...
  • माइक्रोसॉफ्ट के CEO सत्या नडेला भारत आए। दिल्ली में युवाओं को संबोधित करते हुए...
  • वित्त मंत्रालय से स्टार्टअप के लिए टैक्स छूट की अवधि तीन साल से बढ़ाकर सात साल...
  • पुडुचेरीः कांग्रेस नेता वी नारायणसामी ने उप राज्यपाल किरण बेदी से मुलाकात की,...

पाकिस्तान आखिर ऐसा क्यों है

आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार First Published:11-12-2012 07:09:07 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

मैं यह कल्पना कर रहा हूं कि जैन, खत्री, मारवाड़ी, बनिया, चेट्टियार या जितनी भी व्यापार-कारोबार करने वाली जातियों के नाम आप जानते हैं, उन्हें कहा जाए कि वे 31 दिसंबर तक भारत छोड़ दें। अगर सचमुच ऐसा हो जाए, तो क्या होगा? सबसे पहले तो यह होगा कि देश के दस सबसे अमीर लोगों में से नौ इस देश से बाहर हो जाएंगे। दूसरा यह होगा कि हम इन समुदायों का वह तजुर्बा, वह उद्यमिता, वे क्षमताएं खो बैठेंगे, जिन्हें इन्होंने कई सदियों में विकसित किया है। इन्हीं के बल पर उनका समाज पर एक प्रभाव है। उन्होंने व्यवहारवाद की एक संस्कृति बनाई, वे समझौते कर सकते हैं और सौम्य बने रहते हैं। अगर वे चले गए, तो हम इन सबसे हाथ धो बैठेंगे और उत्तर भारत के शहरों पर किसानी करने वाली जातियों का दबदबा कायम हो जाएगा। ये वे जातियां हैं, जिनके लिए आत्मसम्मान सब कुछ होता है, व्यवहारवाद कुछ भी नहीं। अगर आप उन जातियों की सूची बनाएं, जो ऑनर किलिंग करती हैं, तो ये जातियां उस सूची में सबसे ऊपर होंगी। वैसे ही, जैसे अरबपति लोगों की सूची में सबसे ऊपर बनिये होते हैं।
व्यापार करने वाली जातियों की गैरमौजूदगी वाला भारत कैसा होगा? मैं यह कह सकता हूं कि वह ठीक पाकिस्तान जैसा ही होगा। चार चीजें हैं जो पाकिस्तान के विशेषज्ञों को परेशान करती हैं- नीतियों पर फौज का दबदबा, एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो राष्ट्रीय आत्मसम्मान के मातहत रहती हो, अपने दुशमन (यानी भारत) को न तो हरा पाना और न ही उससे समझौता कर पाना, व ऐसा समाज जो मजहबी कट्टरता से टक्कर ले सकने की हालत में नहीं है।
इन सबके जो कारण गिनाए जाते हैं, वे बहुत असंगत किस्म के होते हैं। यह कहा जाता है कि 1947 के बाद मुस्लिम लीग के अलोकतांत्रिक रवैये के कारण वहां फौज का बोलबाला हो गया। भारत से वास्तविक और काल्पनिक खतरों का कारण पुनरुत्थान वाली सोच को बताया जाता है। समाज के अतिवाद का ठीकरा अफगानिस्तान में अमेरिकी दखल और द्रोन हमलों पर फोड़ा जाता है। जबकि इन चारों समस्याओं का असल कारण सिर्फ एक है- वह कारण है जातिगत असंतुलन। दुनिया के एक ऐसे कोने में जहां संस्कृति व्यक्तिवाद पर हावी रहती है, पाकिस्तान में ऐसा कोई समुदाय नहीं है जो इसे खतरे की हद पार करने से रोकता हो।

यह काम खत्री अरोड़ा जातियों के वे लोग कर सकते थे जिनका इस समय दिल्ली की अर्थव्यवस्था पर बोलबाला है। इन लोगों को 1947 में पाकिस्तान से निकाल दिया गया। मेरी अपनी सोच यह है कि 1947 में पंजाबी कौम का जो विभाजन हुआ उसने एक ऐसा पाकिस्तानी पंजाब बनाया जिसमें किसान जातियों का दबदबा है। लेकिन इस तर्क में पंजाब इतना महत्वपूर्ण क्यों है? पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी पंजाबियों की है। विभाजन के समय पाकिस्तान को पंजाब का दो-तिहाई हिस्सा मिला जबकि भारत को बस एक तिहाई। पाकिस्तानी फौज का 80 फीसदी हिस्सा पंजाबी है। हमें जो चार मुख्य समस्याएं दिखती हैं वे सब पाकिस्तान के पंजाब से ही जुड़ी हुई हैं। भारत से ज्यादा पंजाबी पाकिस्तान में रहते हैं। लेकिन आप फोर्ब्स पत्रिका की अमीरों की सूची उठाकर देख लें, उसमें आपको भारत की तरफ के पांच पंजाबी परिवार मिल जाएंगे। फोर्टिस हेल्थकेयर के मलविंदर और शिवेंदर सिंह, एयरटेल के सुनील मित्तल, जिंदल स्टील की सावित्री जिंदल, हीरो मोटरकॉप के बृजमोहन लाल मुंजाल और अवंथा के गौतम थापर। लेकिन इस सूची में पाकिस्तान को कोई पंजाबी नहीं है। क्यों? क्योंकि हिंदुओं का जो धर्मातरण हुआ था वह जातियों का धर्मातरण था व्यक्तियों का धर्मांतरण नहीं। व्यापार करने वाली बहुत कम जातियों ने इस्लाम कबूल किया था। गुजरता के लोहणा के मेमन, वोहरा और खोजा जैसे व्यापारिक समुदायों ने जरूर इस्लाम कबूल किया। आज कराची की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर इन्हीं समुदायों के लोगों का बोलबाला है। लेकिन पंजाबी व्यापारिक जातियों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। सारे बनिया, खत्री और अरोड़ा या तो हिंदू रहे या सिख हो गए। भारत के हिस्से में भी जाट और दूसरी किसान जातियां आईं लेकिन व्यापार करने वाले ज्यादातर पंजाबी भारत के हिस्से में ही आए। जबकि पाकिस्तानी पंजाब को सिर्फ किसान ही मिले। पाकिस्तान का चरित्र इसी विभाजन से निर्धारित हुआ। अविभाजित पंजाब एक स्थिर समाज था, जिसमें एक तरफ हिंदुओं की बहुसंख्या वाली व्यपारिक जातियां थीं, दूसरी और बहुसंख्य मुसलमानों वाली किसान जातियां। विभाजन से जो असंतुलन पैदा हुआ उसके बाद पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बन गया जो फौजियों के दबदबे में ही खुश है। जनरल अशफाक परवेज कयानी (जो लड़ाकों के लिए मशहूर गक्खर जाति के हैं) की अगुवाई वाली फौज पाकिस्तान की विदेश नीति, आर्थिक नीति, सुरक्षा नीति सब कुछ चलाती है। वजह यह है कि वहां के ज्यादातर पंजाबी इस से खुश हैं कि कोई योद्धा उनकी अगुवाई करे।
अब जरा सिंध की ओर देखें। पूरे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था सिंध के एक शहर कराची से ही चलती है। सरकार को मुल्क का 50 फीसदी राजस्व कराची से ही मिलता। कराची में हिंसा होती है, लेकिन यह सांप्रदायिक नहीं है। सिंध पंजाब से ज्यादा सामान्य है। इसका एक कारण यह है कि वहां पर स्थिर समाज है। कैसे? जो सिंधी हिंदू वहां से गए उनकी जगह दो समुदायों ने ले ली। एक तो उत्तर प्रदेश और बिहार से आए पढ़े लिखे मध्यवर्ग ने जिसे मोहाजिर कहा गया। दूसरे दूसरे लोहणा जाति के मेमन, खोजा और वोहरा ने। ये भारत की सबसे प्रतिभाशाली और समृद्ध व्यापारिक जाति है। खुद मुहम्मद अली जिन्ना लोहणा थे। इस वजह से कराची की मोहाजिर और पख्तून समस्या के बावजूद सिंध ज्यादा सामान्य है। क्योंकि वहां किसान और अन्य जातियों के बीच एक संतुलन है। पंजाब में यही संतुलन गायब है।
कहा जाता है कि भारत को समझने के लिए जातियों को समझना जरूरी है। इसलिए मुङो लगता है कि उस इलाके को समझने का भी यही एक पैमाना हो सकता है जो 65 साल पहले तक भारत का ही एक हिस्सा था। मैं यह कहूंगा कि बलूच एक कौम हैं, पख्तून एक कौम हैं, गुजराती एक कौम हैं, तमिल एक कौम हैं, पंजाबी एक कौम हैं, लेकिन पंजाबी मुसलमान एक कौम नहीं हैं। वह अधूरी कौम हैं। यही अधूरापन इसके समाज में है। पाकिस्तान आज जैसा है वह इसी वजह से है। 
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
 
|
 
 
अन्य खबरें
 
देखिये जरूर
जरूर पढ़ें
Bihar Board Result 2016
Assembely Election Result 2016
क्रिकेट स्कोरबोर्ड
क्रिकेट
IPL-9: ये हैं आईपीएल के टॉप 5 यादगार लम्हेंIPL-9: ये हैं आईपीएल के टॉप 5 यादगार लम्हें
सनराइजर्स हैदराबाद के लिए रविवार को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के नौवें संस्करण का खिताब जीतना, आधी रात में सूर्योदय (सन राइजिंग) जैसा था।